निकला था जो खुद की तलाश में तो कारवां बन गया,
निकला उनकी गली की तलाश में,हमगुजर बन गया|
एक रात की तलाश में,चाँद बन गया,
अलसुबह की तलाश में रोशनी बन गया|
इश्क की तलाश में,जुनून बन गया|
फूलो की तलाश में बंसत बन गया,
और अश्को का दौर था,सावन बन गया|
रंगो की तलाश में रुखसार बन गया|
और वफा का साथ था माशूक बन गया| शजर की रहनुमाई थी कातिल बन गया|
इबारत का इकरार था आयत बन गया|
और खुदा के करम पर इबादत बन गया|
निकला था खुद की तलाश में कारवाँ बन गया|
मुखौटे की तलाश में आईना बन गया,
और शोखी की तलाश में दरिया बन गया|
आबरू की तलाश में मोती बन गया|
और खामोशी की तलाश में तस्वीर बन गया|
झंकार की तलाश में पायल बन गया
सब्र की तलाश में फकीर बन गया|
और नेमतो की तलाश में दानी बन गया|
निकला जब खुद की तलाश में तो एक "अनोखा अहसास बन गया|
अंजू निगम
इंदौर
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