गजल(बेबहर)
गुजरती हूँ तेरी गली से कहानी बनकर,
उतरता जाता आँखो में वीरानी बनकर|
आज रेत पर देखे तेरे कदमो के निशां,
उभरती रही पीली यादे रुहानी बनकर|
सदा आती है उन खंडहरो से आज भी,
हमारे वस्ल-ए-इश्क की निशानी बनकर|
बोसे-वफा का आलम रहा इस कदर जो,
मंजर में बसा है आज भी जुबानी बनकर|
पतझड़ भी "अंजू" गिरा हमारे करम पर,
जो रह न सके हम कभी तुम्हारी बनकर|
अंजू निगम
इंदौर
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