गजल
जब रूह में बसता है इश्क तेरी महक बनकर,
आँखो से बहती है एक रात तब कसक बनकर|
मुहोब्बत में बजती है पायल खनक बनकर,
तब रुह में रुह उतरती है एक फलक बनकर|
तैर ही जाता है इश्क तेरा शफक बनकर,
जब जिक्र एक तेरा आता है महक बनकर|
आगोश में समेटता है सावन जब हनक बनकर,
सिसकते है अश्क भी तब दहक बनकर|
बेशक अय्यार से लगते है वो रकीब बनकर,
दोस्ती के उसूलो में,रहो रफीक बनकर|
घुल रहे हैं जज्बात कितने माकुक बनकर,
कुछ नहीं, चलो जोड़ ले दिल अशफाक बनकर|
इबादत भी बहुत की,उनकी मुहोब्बत बनकर,
अब रुह में बसता है इश्क तेरी महक बनकर|
अंजू निगम
इंदौर
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