मांडु में नर्मदा
नर्मदा को समस्त नदियों में प्रमुख व श्रेष्ठ बताया गया है|विश्व में नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है|
तीन साल,तीन माह,तेरह दिनो में ये प्रक्रिया पूर्ण होती है| ये बताती चलूं कि नर्मदा का एक पर्यायवाची "रेवा" भी है|यह परिक्रमा नर्मदा के उद्गम स्थान अमरकंटक से शुरू होती हैं| फिर ये मंडला(संकल पर्वत),जबलपुर, ओंकारेश्वर, इंदौर, मण्डेश्वर,मदेश्वर, सरदार सरोवर, नांडोद,भरुच तक फिर लौटते फेरे में रामकुंड, खंडवा, होशंगाबाद, बरमान,त्रिवेणी संगम, मंडला होते अमरकंटक पर पूरी होती हैं|
रेवा कुंड यानि मांडु की नर्मदा के विषय में रोचक एंव प्रासंगिक तथ्य है| मांडु यानि मांडवगढ़ से जुड़ा नर्मदा का ऐतिहासिक रूप| यहाँ की फिजा रानी रुपमती और बाजबहादुर की अमर प्रेम कहानी की साक्षी है|
एक बार जब बाजबहादुर आखेट करने गए तो उस बियाबान में मधुर कंठ से गाती एक युवती मिली| बाजबहादुर उसके रूप एंव कंठ से मुग्ध हुये और उसे अपने दरबार की मुख्य गायिका होने का निमंत्रण दिया|मगर रुपमती नर्मदा की परम भक्त थी| और नर्मदा के दर्शन के बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करती थी| नर्मदा के दर्शन सुलभ कराने के लिए एक ऊँचे स्थान में रुपमती महल का निर्माण करवाया गया| इस स्थान से प्रातःकाल सूर्य किरणों से नर्मदा का पावन जल चमचमाता था|
इसके अलावा रुपमती महल में पानी आपूर्ति के लिए रेवा कुंड का निर्माण किया गया|
नर्मदा की परिक्रमा के क्रम में रेवा कुंड का अपना महत्व है|कहते हैं कि रेवा कुडं का पानी लिये बिना परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाती|
ये भी प्रचलित हैं कि जब रुपमती वृद्धावस्था को प्राप्त हुई और माँ नर्मदे के अंतिम दर्शन को गयी ,तब हाथ जोड़ दुखी मन से उन्होंने कहा,"माते,अब आपके दर्शनों के लिए आ सकने में मैं असमर्थ रहूँगी|"
कहा जाता हैं माँ नर्मदे ने स्वप्न में दर्शन दे रेवा कुंड के निर्माण का आदेश दिया| तब से अब तक रेवा कुंड में नर्मदा का पानी ही प्रवाहित होता हैं|
हम लोग भीषण गर्मी के समय भी मांडु गये और रेवा कुंड में "मांडु की नर्मदा" के पवित्र रुप के दर्शन किये|
जय जय नर्मदे
अंजू निगम
इंदौर
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें