संस्मरण-मांडु की नर्मदा
लखनऊ से कुछ परिवारिक मित्र आये| तो उनकी फेहरिस्त में सबसे पहला नाम मांडु का ही था| इतिहास के पन्नों पर इसकी वजनदार उपस्थिति हमेशा पूरे शानोशौकत से दर्ज है| जो कुछ उन्होंने सुन रखा था,उससे मांडु को रु-ब-रु देख लेने की अदम्य इच्छा तामील थी| मांडु तो मुझे हमेशा ही खींचता रहा है| उनकी इच्छा देखते दूसरे दिन तड़के ही मांडु के लिए निकल पड़े|हंलाकि मांडु इंदौर से महज १००कि.मी ही दूर है|और अपने वाहन से दो घंटे में आराम से हम पहुँच जाते|फिर भी गर्मी का प्रचंड प्रकोप था,अत: सुबह का वक्त ही ठीक लगा|
तवेली महल में बने गेस्ट हाऊस में नाश्ते-खाने का इंतजाम था| उसके सामने ही बना जहाज महल अपने गौरवशाली इतिहास को सजोये रूपगर्विता सा खड़ा था| जहाजमहल के अंदर बनी कई बावड़ियों में नर्मदा का पानी ही एकत्र किया जाता था| ये बावड़ियाँ जल सुरंग द्वारा मुख्य नर्मदा नदी से जुड़ी थी|
दूसरे दिन हम लोग बाजबहादुर के महल की ओर बढ़े तो रास्ते में ही "रेवा कुंड"के दर्शन हो गये| रेवा नर्मदा का ही पर्यायवाची शब्द है| "रेवा कुंड" और आस-पास के वातावरण के सम्मोहन ने हमे बांध लिया| गाईड ने हमे नर्मदा और रेवा कुंड की रोचक जानकारी दी| गाईड ने हमे बताया की नर्मदा विश्व की एकमात्र ऐसी नदी हैं जिसकी परिक्रमा की जाती है| जो तीन साल,तीन माह,तेरह दिन में पूरी होती है| यह परिक्रमा अमरकंटक से शुरु हो जबलपुर, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मण्डेश्वर जैसे महत्वपूर्ण शहरो से होते वापसी पर रामकुंड, खंडवा, होशंगाबाद, मंडला होते अमरकंटक पहुँचती है| नर्मदा परिक्रमा की ये जानकारी हम आत्मसात कर ही रहे थे कि गाईट ने हमारे आगे इतिहास के कई पन्नों को खोल कर रख दिया|और उस ऐतिहासिक यात्रा में हम देर तक गोते लगाते रहे|
मांडु की नर्मदा की बात हो और रानी रुपमती -बाजबहादुर की अमर प्रेम कहानी के किस्सेगोई न हो तो एक अधूरापन लगता हैं| गाईड हमे इतिहास के मखमली गलियारो में ले गये| वर्णन बेहद सजीव था,जैसे हम उन पलो के साक्षी हो| बाजबहादुर जब एक बार आखेट को गये तो घने बियाबान में एक रुपसी के मधूर कंठ ने उन्हें अभिभूत कर दिया| उन्होंने युवती से उनके दरबार की गायिका बनने का आग्रह किया पर युवती नर्मदा की परम भक्त थी,बिना नर्मदा के दर्शन किये अन्न जल ग्रहण न करती| बाजबहादुर प्रण ले चुके थे कि युवती उनके दरबार की जीनत बनेगी| उसी प्रण के मान का नतीजा"रानी रुपमती महल" था| ताकि युवती को नर्मदा के दर्शन सुलभ हो जाये| हाँ,वो युवती रानी रुपमती ही थी|
तभी महल में जल आपूर्ति के लिए"रेवा कुंड" का निर्माण किया गया|रेवा कुंड के किनारे खड़ी मैं मत्रंमुग्ध सी अपने को उसी समय के अहसास में भिगोती रही| ऐसा रोमांचित कर देने वाले अनुभवो को कैसे शब्दो में बाधं पाती!!!!
गाईड ने जो भी बताया उससे मुझे यही लगा कि मांडु और नर्मदा काल कालांतर से एक दूसरे के पूरक बने रहे और आज भी उसी कालजयी रुप में हमारे सामने है|
मांडु की मेरी ये यात्रा कई मायनो में मन में एक गहरी छाप छोड़ गयी| और वापस आकर भी जब-तब मेरा मन रेवा की अद्धभुत तासीर और मांडु के महलो में विचरने लगता है|
अंजू निगम
इंदौर
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