पाती
बेटे तुम सदा खुश रहो|हो सके तो अपने चाचा को एक बार फोन कर लेना|उन्होंने हमेशा तुम्हारी तरक्की चाही हैं|जुबान के कड़वे जरूर हैं|पर अक्सर तुम बच्चो की जुबान भी उम्र के दायरे पार करती हैं|
आज जब तुम सामने नहीं हो,तब मैं ये बात तुम्हे समझा पा रही हूँ|तुम इन बातो से परहेज करते हो और ये बाते हमारे बीच अबोला पैदा कर देती हैं, सो मैं खत में अपना मन उकेर रही हूँ|
जानती हूँ तुम असहज रहोगे दो-तीन तक|उसके बाद फिर मेरे लिये तुम्हारी फ्रिक लौट आयेगी|
हो सके तो अपने आस-पास दो-चार अच्छे मित्रो को खड़ा रखना|तुम्हारी जरूरत पर पहले वही तुम्हारा साथ देने आयेगे|
तुम्हारा यहाँ मेरे पास एक "माँ"की भूमिका में होना अच्छा लगता हैं|वही निस्वार्थ भाव से मेरे लिये सोचना,जैसे एक "माँ"सोचती हैं, गहरा सूकुन देती हैं|
बेटा,हो सके तो परिवार में सबको लेकर चलने की आदत डालो|माना,परिवार हैं, सबके स्वभाव अलग हैं पर न वे न ही तुम दूसरो को अपने हिसाब से चला सकते हो|इसलिये जो जैसा हैं वैसा ही उसे अपना लो|
मुझे नहीं मालूम बेटा कि सही कौन हैं?मैं जो सबको साथ लेकर चलना चाहती हूँ या तुम जो जरूरत से ज्यादा "प्रैक्टिकल" हो गये हो| मेरा मानना हैं कि अपने परिवार से जुड़े रहना अपनी जड़ो से जुड़े रहने जैसा हैं|
कभी फुरसत में बैठो तो ठंडे दिमाग से इस पर सोचना|बाकी ये "माँ" हमेशा हैं तुम्हारे साथ,अपनो को लिए|
माँ
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें