मुकदमा
बचपन के टुटते-जुड़ते सपनो के बीच मैनें अपने लिए वकालत का ही पेशा चुना|पिताजी की गिनती शहर के नामी वकीलो मे थी|
पिताजी के ही अंडर काम करने का मैंने मन बना लिया था|
कितने महीने निकलते गये और केवल केस स्टडी करने,उसमें छोटे से छोटे बिंदू ढुंढने,नोटिस भेजने तक ही मेरी वकालत सिमट रही थी|
"क्या मैं नोटिस भेजने पर ही अटका रहूँगा?"मेरा मन बागी हो रहा था|
पिताजी मेरा मन पढ़ चुके थे|तभी उस सवेरे मुझे बुला कर कहा,"तुम्हें याद हैं, गाँव में हमारी जमीन और मकान हैं?"
"हाँ,याद हैं?"मैं बेमन बोला|
"उस पर किसी ने कब्जा कर लिया हैं|जाओ एक नोटिस उन्हें पकड़ा दो|"
"एक और नोटिस!!"
"ये तुम्हारा पहला केस हैं|जाओ,कोशिश करो और केस का रूख अपनी तरफ मोड़ लो|"
करीब १२साल बाद मैं उस गाँव में खड़ा था|पहले जैसा बदहाल|मेरा ईटो से बना घर टुट चुका था|उसकी जगह झोपड़ी खड़ी थी|
मैं हाथ में नोटिस लिए उस दरवाजे खड़ा हो गया|
"अम्मा,कोई आया हैं|"धूल में लिपटे उस बच्चे ने आवाज लगायी|लगा जैसे मैं ही बोल रहा हूँ|मैं भी तो यूँ ही आवाजे देता था|
झुर्रियों से अटा एक चेहरा बाहर निकला|बिना कोई भुमिका बनाये मैं बोल उठा|
"अम्मां, ये जमीन रामकिशोर की हैं|आपने इस पर अवैध कब्जा जमा रखा हैं|१०दिन में ये जमीन खाली करनी होगी|"
"जा,किशोर से कह दे,अभी उसकी भाभी जिदां हैं|वो किसी नोटिस को नहीं मानती|"
वो कहती रही और मैं उनकी झुर्रियों से एक चेहरा निकालने की कोशिश करता रहा|
हाँ, ये मेरी बड़ी अम्मां हैं|जिनकी गोद में मेरा बचपन बीता ,उन्हें ही बिसराने का अपराध कर बैठा!!!
"ताई,मैं आपका नटखट|आपके किशोर का बेटा!!"
वो देर तक मुझे तकती रही|फिर मुझे सीने से लगा सुबक उठी|दरकते रिश्ते जुड़ने लगे थे|
मेरे हाथ में दबा नोटिस मुठ्ठी में ही कैद रह गया|
"पिताजी, मैं अपना पहला मुकदमा जीत गया|"मै बुदबुदा उठा|
अंजू निगम
देहरादून
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