दर्द तो साझा हैं न

दोनो का तलाक होना तय था|आज दूसरी पेशी थी|वजह मामूली थी|पर रिश्तेदारो की बेवजह की दखल और  अहम् के ऊँचे पहाड़ ने बात तलाक तक पहुँचा दी|
    १० बजे उनके केस की सुनवाई होनी थी|कोर्ट रूम में पहुँचने के लिए दोनो आमने-सामने से आ रहे थे|
"तुम्हारा बहुत सामान रह गया हैं पीछे|जैसा छोड़ गयी थी,वैसा ही रखा हैं|आकर ले जाना|कही सामान हड़प लेनै का एक और इल्जाम न लग जाये|"न चाहते भी मानव की आवाज तल्ख हो गयी थी|
मानसी ने सिर उठा कर देखा|क्या हाल कर लिया इतने दिनो में?बड़ी हुई दाढ़ी,बेतरतीब बाल,सलवटो से भरे कपड़े|
उसे शर्म भी आई,जाने कितने बेवजह के गलीज इल्जाम भरी अदालत में मानव की ओर उछाले गये|ये तो कभी न चाहा था उसने!!!!!उसकी आँखो में जमाने भर का दर्द भरा था|मानव के चेहरे पर  वो अपने को ही मानो देर तक टटोलती रही|इस अलगाव को दोनो आधा-आधा भोग रहे थे|
  अगले ही दिन मानसी अपने बचे सामान को लेने मानव के यहाँ पहूँच गयी|माँ भी साथ आना चाहती थी पर उसने ही टाल दिया|सामान लेने का तो बहाना भर था|कुछ मीठे पलो की खुरचन भी तो थी जिसे वो सहलाना चाहती थी|
     आखिरी सूटकेस उठाते उसके हाथ लरज रहे थे,"क्या सब कुछ खत्म, आज से ,अभी से|"
  मानव उसके पीछे आ खड़ा हो गया था|चाह रहा था कि मानसी बस रूक जाये,बिना कुछ कहे,बिना कुछ सुने|
   अहम् फिर उठ रहा था|
  "जा ही रही हो क्या?"मानव का सब कुछ छीना जा रहा था|
"पहले रोक कर देखा होता|"मानसी का मन भीग रहा था|
"मैं रोक लेता तो क्या रूक जाती?"
"हाँ रुक ही जाती शायद|"
"तो मत जाओ|अब रूक जाओ|बहुत अकेला सा हो गया हूँ तुम्हारे जाने के बाद जाना,तुम्हारा न होना|"
"मैंने भी तो!!!मैं भी तो तुम्हारे बिना कितना अकेले जी हूँ|"मानसी का स्वर रूधं रहा था|
"जब दर्द इतना सांझा जीया तो थोड़ी खुशी भी साथ जी ले न|"
           अंजू निगम
             देहरादून

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