1) प्रथम श्रेणी-गजल
वो कहते थे कभी मुझे दोस्त अपना,
आज दुश्मनो से हाथ मिलाये बैठे हैं|
जो बद्दुआ देते थे मुझे जमाने भर की
आज घर अपना ही जलाये बैठे हैं|
कल जो कसीदे पढ़ते थे मेरी शराफत के,
आज एक बाजार बदनाम सा लिये बैठे हैं|
जो शजर उगाते थे बोसे-वफा के,
आज इश्क के पतझड़ सजाये बैठे हैं|
मेरे हर ख्वाब पूरे होते थे जिनसे,
आज नींदो को मेरी फकीर बनाए बैठे हैं|
जारी किये थे फतवे जिन्होंने मेरे नाम के,
आज खुद के कत्ल का पैगाम लिए बैठे हैं|
शिद्दत की ही कमी हैं शायद अब,
मुहोब्बत के जमाने वे भी देखे बैठे हैं|
अंजू निगम
इंदौर
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