तोहफा
रात के नितान्त निजी क्षणो में शील बड़े दुलार से पुछ रहे थे,"अगले हफ्ते तुम्हारा जन्मदिन हैं?क्या तोहफा चाहिए तुम्हें?वही लेकर दूँ तुम्हें|"
स्नेहा के कानो को विश्वास न हुआ|उसे याद आया एक हफ्ते पहले का वो दिन|
बड़े दिनो के बाद भैया-भाभी आये थे|स्नेहा का मन खिल उठा|पर उन्हें देख शील एकदम बुझ गये|आधे घंटे तक शील को उनसे मिल लेने की फुरसत ही नहीं मिली|भैया के चेहरे पर कई भाव तैर गये|
"बेटा हमे जल्दी निकलना होगा|दामाद जी से एक बार मिल लेते|"जैसी बेबसी भैया जी रहे थे वैसी ही बेबसी वो हमेशा जीती हैं, जब भी भैया आते हैं|
"बोलो,क्या लेना चाहती हो?"शील ने प्यार से स्नेहा को अपनी तरफ खीचंते हुये कहा|
शील की ये प्रेम पगी बाते कितनी क्षणिक थी,इतने दिनो के साथ से स्नेहा इतना तो जान चुकी थी|
"इस बार तो मुझे बहुत मंहगा तोहफा चाहिए|" स्नेहा भी प्यार से बोल उठी|
उसने देखा कि लाखो में कमा रहे शील का प्यार कपूर बनने लगा|
"ऐसी कौन सी चीज चाहिए तुम्हे?शादी के पहले तो........"कुछ कहने को हुये शील ने वाक्य अधुरा छोड़ दिया|
"मुझे मालूम है इतनी मंहगी चीज आप मुझे दे ही पायेगे|"स्नेहा पहेलियाँ सी बुझाती शील के अहम् को चुनौती दे रही थी|
"अब बताओगी भी या यूँ ही पहेलियों में उलझाती रहोगी?"शील के स्वर में झल्लाहट भर रही थी|
"इस जन्मदिन में मुझे मेरा वो "हक" और "सम्मान"चाहिए जो एक पत्नी की हैसियत से मुझे मिलना ही चाहिए|क्या आप मेरा वो स्वाभिमान मुझे लौटा पायेगे जो शादी के बाद जाने कहाँ खो गया|क्या आपकी भी ऐसी हैसियत........."बाकी के अहसास स्नेहा ने भी मन में दबा लिए |
अंजू निगम
इंदौर
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