बेफ्रिक सा आलम
आज भी चार डिब्बे खाने की मेज पर सजे थे|मेरे उठने तक अम्मां चाय बना मानो मेरा ही इंतजार करती मिलती|एक नियम सा बन गया था|
अंम्मा की ममतामयी छांव ही थी,जो मेरी नौकरी पनप गयी|पीछे वो कभी बच्चो कभी हमारा ख्याल कर जाने कितने पकवान पाक लेती|
"अंम्मा तनिक अपना भी सुभीता कर लिया करो|इतना काम क्यों ओढ़ लेती हो?"मैं अक्सर दोहरा लेती|
"तुम सबके पीछे मन नहीं लगता|वैसे भी खाली नहीं बैठा जाता|और फिर पूराना खाया-पिया शरीर हैं बिटिया, इतनी जल्दी जंग नहीं लगेगा|"कह उनका ममतामयी चेहरा खिल उठता|मैं बलिहारी जाती|
निलय कभी बेतरह खीज उठते मुझ पर,"अंम्मा की ये काम की उमर हैं क्या?"
पर अंम्मा के रहते वे भी तो कितनी बेफ्रिक हो चले थे|
लेकिन आज अंम्मा चाय पर मेरा इंतजार करती नहीं दिखी|कहाँ चली गई होगी?शायद लॉन में!!!पर वे नहीं थी वहाँ पर|रसोई सूनी पड़ी थी|एक चक्कर उनके कमरे का भी लगा लूँ,अंम्मा एकदम अविचलित सी ,मानो अभी ही गहरी नींद लगी हो,लेटी थी|
"तबीयत ठीक नहीं क्या अम्मा की"सोच सिर पर हाथ रखा,एकदम ठंडा|सांस थमी थी,नब्ज गायब|मेरी चीख निकल गई|
यूँ अचानक, बिना कुछ कहे-सूने|यकीन नहीं होता था|निलय का रो रोकर बुरा हाल था|पिताजी के बाद अम्मा ने इतना संभाल लिया था सब कुछ कि दूनिया के छल-प्रपंच से कोसो दूर निरह कोरी मिट्टी ही बने रहे|
अम्मा के बिना हमारी सोच कुंद हो गयी थी|दूसरे शहर रहती जिज्जी ने आकर सब संभाल लिया,हमारे संभल लेने तक|
तेरह दिन के बाद हम अकेले थे|बिना अम्मा के|स्कूल-ऑफिस कितना छुट सकता था|पर आज का दिन अलग था|अपने-बच्चो के टिफिन बनाने से लेकर उन्हें बस-स्टॉप तक छोड़ने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गयी थी|लगा जैसे निलय भी माँ का आंचल छुटते ही एकदम बड़े हो गये थे|दूध लाना,सब्जी लाने जैसे काम उन्होंने खुद के हिस्से में कर लिये थे|आपस में काम बंटे तो जिदंगी की गाड़ी फिर पटरी में आने लगी|
सब कुछ ठीक होने तो लगा पर मन में ये बात सालती रही|आज भी तो अम्मां के बिना सारे काम हो ही रहे थे|फिर अम्मां के जीते-जी क्यों हम उन्हें कोई आराम नहीं दे पाये?क्यों बेफ्रिकी का आलम इतना तारी हो गया कि अम्मां के हिस्से का सुख उन्हें मिल ही नहीं पाया?
अंजू निगम
इंदौर
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