शहीद
 
   सीमा पर गोलीबारी शुरु हो गयी हैं।सीमा से सटे गाँव के गाँव खाली कराये जा रहे हैं। माहौल तनाव से पटा|सेना के ट्रको का काफिला ,सैनिको और रसद से लदे सीमा की ओर बढ़ रहे हैं।
     इधर छः महीने की "कठिन पोस्टिंग" में तैनात सुबेदार मंगतराम दो दिन पहले ही गाँव आया हैं।दो दिन बाद ही उसकी घरवाली का गौना होना है। माई पूरे मनोयोग से तैयारी में जुटी हैं।

  दोपहर डाकिया एक तार पकड़ा गया ।मंगतराम की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई । उसे तुरंत हेड ऑफिस रिपोर्ट करने को कहा गया हैं।
    माई का कलेजा मुँह को आ जाता हैं।
"अभी तो अपने लाल को जी भर निहारा भी नहीं मैंने।कैसे भेज दूँ अपने इकलौते लाल को जंग में।"
"माई,वहाँ और लाल भी गये हैं। अपना कलेजा मजबूत रख। तु फौजी की माँ हैं।तेरी आँखो में आँसू अच्छे नहीं लगते|अच्छे मन से विदा कर माई।"
माई सब समझ गयी। अपने लाल की ढेरो बलईयाँ लेती हैं और खाने के डिब्बे के साथ,दुआओं से भरी गठरी भी बांध देती हैं।
     माई की दुआएँ खुब फल रही हैं। मंगतराम दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर रहा हैं।
  अपने ही साथी को बचाते मंगतराम बुरी तरह घायल हो चुका हैं। चारो तरफ क्षत-विक्षत शव पड़े हैं।मंगतराम जेब से माँ की तस्वीर निकालता हैं,"माई,देख,तेरा लाल कितनी दिलेरी से लड़ा।मेरी बलईयाँ ले ले।पर अब मैं जाता हूँ माई!!!अगले जन्म तेरा ही बेटा बन कर आऊँगा।"
   गाँव में सुबेदार मंगतराम को पूरे राज्कीय सम्मान के साथ अंतिम यात्रा के लिए ले जाया जा रहा हैं। माहौल गमगीन हैं। सबकी आँखे नम। एक माई की आँखे सूनी हैं।
"माई,रो ले,दिल हल्का हो जायेगा।"
"मैं एक शहीद की माँ हूँ|मेरे चेहरे पर आँसू अच्छे नहीं लगते।"
  आखिरी बार बेटे का माथा चूम उसकी ढेर सी बलईयाँ ले लेती है। आज गर्व से उसका चेहरा तना हैं।
            अंजू निगम

            देहरादून
    (  मौलिक )

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