दो पहलू

 1)
बेटा बेतरह बीमार हैं|उसकी हालत नाजूक बनी हैं|बाप डाक्टर के पैरो पर गिर जाता हैं|अपने इकलौते बेटे को बचा लेने की भीख माँगता हैं|डॉक्टर इलाज का खर्च ३ लाख बताते हैं|
"डॉक्टर साब,आप इलाज शुरु करे,मैं दो दिन में कही से भी पैसो का इंतजाम करता हूँ|"
   सब तरफ से निराश हो दामाद को फोन करते हैं|दामाद कहता हैं,"कल तक पैसो का इंतजाम कर मैं आपकी बेटी के हाथो भिजवा दूँगा|"
  पैसो का इंतजाम होते ही बेटे को बेहतर इलाज मिलता हैं और वो ठीक हो जाता हैं|
साल निकलते जाते हैं|बेटा अपनी पंसद की लड़की से शादी कर अलग घर बसा लेता हैं|

2)
आज बाप बीमार अस्पताल के बिस्तर पर हैं|बेटे को चले आने की गुहार लगायी जाती हैं|जिसे बेटा कुटिलता से नकार देता हैं|बेटी-दामाद पिता की तबीयत जान उनके पास आ बने हैं|बेटी पिता की जी-जान से सेवा करती हैं|पर बेटे की बेरूखी उन्हें घुन की तरह खा रही हैं|
"आप क्यों दुख मनाते हैं!!मैं हूँ न आपका बेटा|"बेटी बाप को तसल्ली देना चाह रही हैं|
   उधर बेटा बाप का अंतिम समय और बहन का पिता के पास बने रहना जान, वकील को ले पिता के पास उपस्थित हो जाता हैं|
"आप इन कागजात पर दस्तखत कर दीजिये|"कह कागज और पेन पकड़ाता हैं|पर उससे पहले ही पिता के हाथ  ढलक गये हैं|
     एक बेटी पिता को खो देने का शोक मना रही हैं|पर बेटा र्निविकार खड़ा है|
"जिस मकान के कागजात तुम लिए खड़े हो|वो तो पिता ने कबका तुम्हारे नाम कर दिया था|पर तुम्हारी बेरूखी देख अब माँ के नाम कर दिया हैं|माँ के बाद सारी संपत्ति ट्रस्ट में चली जायेगी|"बेटी ये बोल एक कागज भाई की ओर बढ़ा देती हैं|
पिताजी की लिखावट में,"तुम्हारी बीमारी में मैंने जो कर्ज लिया था उसकी किस्ते अब तुम चुकाओगे|ऐसा न करने पर तुम्हारी चल-अचल संपत्ति जब्त कर ली जायेगी|"
  बेटे के हाथ पिता की ये वसीयत फड़फड़ा रही हैं|
       अंजू निगम
        इंदौर

  

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