बालकनी
सामने का फ्लैट जो अरसे से सुना पड़ा था,आज रौनक खींची हैं|कोई वहाँ रहने आ गया हैं|
उस सवेरे जब मैं चाय का कप लिए बालकनी में आई,पड़ोसन की बालकनी फूलो और सजावटी पौधो की हरियाली से गमक रही थी|उसके आगे मेरी बालकनी बहुत उदास और उपेक्षित लगी|
मुझे ही कभी पेड़-पौधो से लगाव नहीं रहा|क्या पौधे रोपो,गुड़ाई करो,पानी दो,दुनिया के झंझट|फिर जो गमलो से पानी रिसे,उसकी अलग छिछालेदर|
पर आज मन अलग दिशा में सोच रहा था|अगले दिन खाली गमलो की लाइन लगी थी|पर आगे का काम कैसे हो?पड़ोसन से पुछना मेरे अहम को गवारा हुआ|सो,एक आया(माली) की व्यवस्था की गई, जो मेरे आने वाले बच्चो(पौधो) को पाल-पोस दे|मन ने सोचा,एक और खर्चा सर आ गया|पर ओखली में सर दिया था तो मूसल से कैसा डर!!!
माली की मेहनत पर जब रंग चढ़ा,तो मेरी सारी बालकनी फूलो की खुशबू से महक उठी|उस दिन पड़ोसन की नजरे भी मेरी बालकनी की ओर थी|हमारी नजरे मिली और वो मुस्कुरा उठी|
"ओहो, मेरी ईको फ्रेंडली दोस्त"मेरे मन ने कहा|
अब मेरी सुबह बहुत ताजी होती हैं|पक्षियों के लिये सकोरो में पानी और बाजरे बिखेरना, मेरा पहला काम हैं|
हरियाली बालकनी और चिड़ियों की चहचहाहट मेरा दिन शुरू करते हैं|जिससे मेरा अवसाद से घिरा मन नये सवेरे ढुंढने लगा हैं|
मेरी"ईको फ्रेंडली"दोस्त से दोस्ती गाढ़ी हो गयी हैं|जल्द ही हम "स्वच्छ भारत अभियान"से जुड़ अपनी पूरी कॉलोनी में पौधे रोपने और जगह जगह कचरा पेटी रखने जा रहे हैं|
अंजू निगम
इंदौर
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