"सूरज छिपने तक" के अंर्तगत
तुम मुझसे बेपनाह मुहोब्बत करती थी|तुम्हारे प्यार में सर्मपण था,छलावा नहीं|मैं भी तो उसी शिद्दत से तुम्हे प्यार करता था|दुनिया की सारी खुशियाँ तुम्हारे कदमो में डालने को आतुर|
उन खुशियों को खरीदने के पैसे लगते थे|फिर कब तुम्हारी खुशियाँ खरीदने के लिये पैसे कमाना मेरा जूनुन बन गया,मुझे पता नहीं लगा|मैं बहुत व्यस्त हो गया था|और तुम्हारे अकेलेपन का अहसास होना मुझे अब नहीं होता था|न तुमने कभी अहसास दिलाया|
तुम्हें बीमारी ने आ घेरा|तुम उससे अकेले जुझती रही|शायद मुझे बता तुमने जरूरी नहीं समझा|तुम्हारी झुलती देह ,निचुड़ा चेहरा मुझसे कभी तुम्हारी सेहत की चुगली न कर पाये|
जाने से पहले तुमने मेरे कान के करीब आ कहा था,"मेरे जाने के बाद मेरी मजार पर दो गुलाब जरूर चढ़ा देना|एक में तुम,एक में मैं बसी रहूँगी|तुम मेरे पास हो,मेरी रूह को ये करार रहेगा|"
फिर तुम चली गयी|एक रीतापन तो था,पर तुम्हारी आदत होना,कबका पीछे छुट गया था|
उस दिन किसी काम से जब,शायद अरसे बाद तुम्हारी अलमारी खोली,तो मेरा मन तुम्हारी यादो की खुश्बु से भर उठा|
अब तक में इसी गफलत में जीता रहा था कि तुम्हें कुछ नहीं पता,जब तक तुम्हारी डायरी मेरे हाथ नहीं लगी|सारे पन्नों को फाड़ दिया गया था|उस एक पन्ने को छोड़कर|
जिसमें कुछ यूँ लिखा थाः"हमारे बीच अब "वो"आ गयी हैं|
नीचे केवल तुम्हारा नाम,बगैर मेरे नाम के|
अंजू निगम
इंदौर
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