दंश
मेरे इकलौते बेटे के लिए लड़कियों की तस्वीरे देखी जा रही हैं|वैसे तो मेरी राय कोई महत्व नही
रखती,पर बेटे के कहे पर मै भी सबके बीच बैठ गयी हूँ|आज तक घर के सारे बड़े फैसले पति और दोनो ननदो के हिसाब से ही हुये हैं|
मेरा रंग थोड़ा दबा है और नाक-नक्श औसत|इस दबे रंग ने मेरे सारे गुण हर लिये है|पति और ननदो की उपेक्षा ने मेरे रहे-सहे स्वाभिमान को जमीन पर खड़ा कर दिया है|
पर मैंने अपने बेटे में खुब शालीनता और संस्कार भरे हैं|मेरे मन मे एक इच्छा है कि मेरा बेटा अपनी मिट्टी और संस्कृति को पहचाने|उसका मन भी मेरी भावनाओं को पहचानता हैं, तभी न उसने विदेशी कंपनी के प्रस्ताव को ठुकरा यहां की कंपनी ज्वांइन की हैं|
बेटे की शादी की बात उठते ही दोनो ननदे हाजिर हो गई है|तस्वीरो का ढेर लगा है|सब अपनी राय दे रहे हैं और मैं मुक दर्शक सी वहाँ बैठी हूँ|
"अरे!!!तु भी तो अपनी राय दे|आखिर शादी तो तुझे ही करनी है|"बड़ी जिज्जी बेटे को देख बोल उठी|
"हाँ, और क्या!!!!अपनी पंसद बता|हमे आसानी होगी"|
"सरला,जाकर चाय का पानी चढ़ा आ|साथ में कुछ नाश्ता बना देना|"बड़ी जिज्जी का आदेश मेरे लिए|
मैं उठी तो बेटे ने हाथ पकड़ लिया|
"मुझे तो माँ जैसी लड़की चाहिए|जो लड़की माँ पसंद करेगी,वही मेरी पंसद होगी|"
मेरी आँखे छलछला आई हैं|खुशी और गर्व से मेरी आँखो से जो सैलाब बहा,वो बरसो से हुई मेरी उपेक्षा के दंश को बहा ले गया|
अंजू निगम
इंदौर
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें