"इंसान के चेहरे"के अंर्तगत

     शर्मा जी आ सुस्त से सोफे में धंस जाते हैं|
  "क्या हुआ इतने सुस्त क्यों हो?"श्रीमतीजी ने पुछा| 
"आज तो गजब की गर्मी है|"
"गर्मी तो एक महीने से पड़ रही हैं| आज कुछ खास तो नहीं बढ़ी|"
शर्मा जी चुप|
"लाइट नहीं थी क्या ऑफिस में"|शर्माइन बोली|
"हाँ लाइट चली गई थी"
"बैक अप लाइट नहीं हैं क्या"
"हैं|पर उससे केवल पंखा चल रहा था|"
"तुम्हारे लिए क्या नया हैं|घर मे तो पंखे मे ही बैठे रहते हो|"
"घर मे बिजली का बिल भरना पड़ता है श्रीमती|
श्रीमती के चेहरे पर व्यंग्य रेखा खींच जाती है|
"तुम्हारी बिजली बचत भी गजब की है|शाम होते सारे घर में सी.एफ.एल जला दोगे|जहाँ जरूरत न हो वहाँ भी|१५वॉट के बल्ब में आँखे फाड़ कर देखो तब भी साफ नहीं दिखता|कितनी बार कहा कि एक कमरे में ट्युब लाइट जलते रहने दिया करो|ए.सी चलाते हो रात की नींद उचट जाती हैं तुम्हारी|घात लगा कर बैठते हो जैसे कि कब सब सोये और कब ए.सी बंद करे|"
     शर्मा जी को जवाब नहीं सुझता तो बोल उठते हैं,"आजकल बहुत सयानी हो गयी हो||"
   "आज कहे देती हूँ रात में ए.सी बंद मत करियेगा|"श्रीमती भन्ना जाती है|
  "तो जाओ अपने मायके से बिजली का बिल भरवा लाना|"
  "हर बात पर अपनी गाड़ी मेरे मायके की तरफ न मोड़ लिया करो|"
   श्रीमती का रूख देख शर्मा जी के हाथ ए.सी बंद करने नहीं उठ पाते|पर रात भर बिजली के चढ़ते बिल के साथ उनका रक्तचाप भी बढ़ता जाता हैं|
    दूसरे दिन शर्माजी एक कमरे में ट्युब लाइट लगवा ही देते हैं|और उसी कमरे में कुलर|कही तो बचत करनी ही पड़ेगी|
      ऑफिस में भी शर्मा जी का सुधार अभियान चल रहा हैं|बेवजह चलते पंखो और लाइटो को बंद करने और जरूरत पड़ने पर ही इस्तेमाल करने की सख्त हिदायत दी हैं|
       श्रीमती के कड़वे पर खरे बोल अपना काम कर ही गये हैं|
                   अंजू निगम
                     इंदौर

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