धूधं(2)
 
    चार दिन बाद पग फेरे की रस्म थी|वो एकदम सामान्य थी|पर उसका दिमाग सरपट दौड़ रहा था|उसे चार दिन मिले थे,चाहे जीवन संवार लेती या इसी गर्त का हिस्सा बन जाने को तैयार रहती|वो पढ़ी-लिखी थी,विपरीत परिस्थितियों को कई बार झेला और उससे निकली भी थी|चाहती तो यूँ ही सब तज कर जा सकती थी|पर उससे'वो'नहीं मिलती|सास जैसी शातिर  बात को जाने किस मोड़ तक पहूँचा उसे ही कठघरे में खड़ा कर देती,जिससे उबर ही न पाती वो|अपनी बात साबित करने के लिये उसके हाथ सूबुत होने चाहिए थे|
                ये सब करने के लिए घर के किसी को तो सांचे में ढालना था|चचिया ननद से पुछने का जोखिम वो अभी नहीं उठा सकती थी|सो,उसने"मम्मा बॉय"को ही सांचे में ढालना शुरू किया|देखने मे औसत,उसका कथित पति अक्ल का भी पैदल लगा उसे|
          पति को शायद ताकिद थी कि नयी बहू से जरा नरमाई से पेश आये और उसे पूरा सहयोग दे|बस,उस मूढ़ इंसान ने फिर वो खुलासे किये कि उसका दिमाग चकरा गया|यही नहीं"उस औरत"को सामने ले आने का प्रस्ताव भी पति की ओर से ही आया|
     "पति"ने ही बताया कि "पहली"की गल्ती ये थी कि वो इस वंश को वारिस न दे पायी|जिसकी वो "सजा"भुगत रही थी|और तो और कई डिग्रियों से सुसज्जित श्रीमान केवल १०वीं पास थे|
  उसने चार दिन तक "पति"को अपने तक समेटे रखा|सास को भला क्या ऐतराज था!!!
     चौथे दिन "उस औरत"को पीछे के रास्ते निकाल खुद सामने के रास्ते निकली|"पति"तो साथ दे ही रहे थे|चार दिन की"जेल"से आज वो बाहर आयी थी|और "वो"जाने कितने वर्षो के बाद|
     पति के चेहरे पर खुशी थी|उन दोनो को मुक्त कराने की या.......|
       जो भी हो सास को कठघरे का रास्ता घर के विभिषण ने ही दिखाया|
              अंजू निगम
                इंदौर

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