धुंध
मुँह तक घुघंट काढ़े,कामदार चुनरी और भारी लंहगा,कुहनी तक मेंहदी भरे हाथ,कलाईयों में खनकती चुड़ियाँ,महावर लगे कोमल पैर,ऊँची ऐड़ी की खट-खट करती,आँखो में सुनहरे सपने भरे नयी दुल्हन इस आंगन में उतरी,जाने कितने नये रिश्तो में अपने को बांधती|
भोर तक फेरे और रस्मो ने उस पर थकावट भर दी|ससुराल में जरूरी रस्मे निपटा उसे नहा-धो आराम करने की ताकीद दे उसकी सास और कामो में व्यस्त हो गई|नयी बहू को ये बात शिद्दत से खली कि जिस शख्स से बंधी वो इस घर आयी थी,वही इन रिश्तेदारो की भीड़ में जाने कहाँ घुम था|थकी थी इसलिए ज्यादा ध्यान न दिया|शाम को बहू के हाथ की पहली रसोई थी|कढ़ी और गुलगुले बनने थे|मायके में खाना बना लेने का ज्यादा अनुभव भी न था|उसके हाथ-पैर फूल गये|पर चचिया ननद ने सहारा दिया|
"भाभी,आप परेशान मत हो,मैं बताती जाती हूँ आप बना लेना|"
उस समय उसे अपनी चचिया ननद फरिश्ते से कम न लगी|ये सब ताम-झाम चल ही रहा था कि एक औसत चेहरे-मोहरे वाली औरत आ उसके सामने खड़ी थी|उसे देख ननद बेतरह चौंकी|ननद के चेहरे के भाव वो समझ न पायी|उसे लगा कि घर की कोई "खास"हैं इसलिए पैर छुने झुकी कि उसने बीच में ही थाम लिया|
उसके चेहरे पर असंमजस समा गया|
"है कौन ये?ननद भी मुँह सीये है?"बहू ने सोचा|
"आपको सुबह से पहली बार देख रही हूँ|आपssss!!!!आपको क्या कह कर बुलाँऊ"बहू ने पुछ ही लिया|
उसका ठहाका गुंजा,उसमें दर्द खुब घुला था|फिर चचिया ननद को देख बोली,"क्यों बिट्टो,तुमने भाभी को बताया नहीं कि मैं कौन हू्ँ?"कह व्यंग्य से फिर हंसी|
बहू कभी ननद को देखे,कभी उस औरत को|
"आज ही ब्याह कर आई हो|रहोगी भी इसी घर में|धीरे-धीरे सब जान जाओगी|"कह वो जाने लगी|
नयी बहू सारी लज्जा तज सामने जा खड़ी हूई|"आप ये भेद बता दीजिए|नहीं तो मेरा अंतस परेशान रहेगा|"
"लाडो,तुम्हारा अंतस क्या गवाही देगा कि एक पत्नी के सामने रहते तुम दूसरी पत्नी बन इस घर में रहो"?
"आप क्या कह रही है?मुझे समझ नहीं आया"बहू एक अंजाने सच के सामने आने से कांप रही थी|
"मैं पहली पत्नी हूँ तुम्हारे पति की|तुम्हे विश्वास हो त़ो इससे पुछ लो|"सामने खड़ी ननद की ओर उसने इशारा किया|
"तो आज क्यों?पहले क्यों नहीं?क्यों मेरा जीवन बरबाद होने दिया"?बहू कांप रही थी|
इससे पहले वो कुछ जवाब देती,उसकी सास दो-तीन रिश्तेदारो को ले आयी|
"पकड़ो इसको!!!यहाँ खड़ी नयी बहू के मन में जहर भर रही है|ले जाओ इसको!!"
सास स्नेह से उसके सर पर हाथ फिरा बोली,"पागल है!!!इसकी बात़ पर ध्यान न देना"|
पर ननद की चुप्पी और उस "औरत"की आँखे बहुत कुछ कह रही थी|सवाल कई तैर रहे थे उसके मन में|जिसके जवाब जानने के लिये उसने सास के कहे को सच मान लेना ठीक समझा|
एक धुंध तैर रही थी जिसे उसे साफ करना था|
अंजू निगम
इंदौर
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें