ऐगी-मैगी
मंदिर से लौटती अम्मा की भक्ति भावना घर के चौखट लगते तेज हो गयी|सामने दालान में पड़ी चारपाई पर बैठे मुन्ने पर उनकी नजर गयी|माले पर उगलियाँ फेरती अम्मा उस ओर ही बढ़ गयी|
मुन्ने की थाली पर नजर पड़ते ही अम्मा जैसे चीत्कार उठी|
अरे मोरी मईया!!!!बहूरिया ई हमार लल्ला को का केचुंल खिला रही हो?राम-राम सारा धरम भष्ट्र कर दिया!"
दरवाजे की ओट लगी,मुँह में कपड़ा ठूंसे बहू बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकते बोली,"अम्मा, ये केचुंल नाही, मागी है मागी"!!
"मागी!!ई का होता है?"
"शहर से छोटु आया हुआ है|बस वही कल खाहे रहे मुन्ना ये मागी|आज जिद पकड़ा तो मुन्ना का बापू दुकान से ले आये रहे|"
"रूको,आये देयो कालू का,अच्छी खबर लेती हूँ|और बहू तुमका भी दिमाग फिराये गयो है का!अंट-शंट खिलाती रहती हो,दाल-भात हलक से उतारते शरम आता है का"
"ई का हरा हरा रखा है बोतल मा"अम्मा बोली|
"ई तो हरा चटनी है|शहरवाले इसे"चिली सास"कहते है"बहू के दबे बोल निकले|
"तुम दोनो माँ-बेटा कान खोल सुन लो|आगे से आगी-मागी खाये तो यही "चिलीयऊ सास"पेल देगे ऊपार"अम्मा का रौद्र रूप देख मुन्ना थालघ छोड़ माँ की ओट ले खड़ा हो गया|
उधर रहट का पानी उलीच कालू मरियल साईकिल घसीटते घर की ओर ही बढ़ा आ रहा था कि अम्मा का पंचम सुर उसके कानो में पड़ा|"ई कौन नया खेला अम्मा शुरू की आज"सोचते घर के मुहाने साईकल टिका जैसे ही भीतर पैर रखा"का रे कलूआ ई का नया शगल शुरू किया|लल्ला की आंते चिपक जायी|"
"का अम्मा मुन्ना जरा "मागी"खा लिया तो काहे घर उठाये हो सर मा"कालू विरोध करता बोला|
"तुम ता चुप्पे ही रहो|जोरु का गुलाम है पूरा!!का जो तेरा महरारू कहेगा वही करेगा "|
अम्मा का रौद्र रुप देख सब इधर-उधर खिसक लिये|
अम्मा आराम से चारपाई पर आसनी जमा बैठ गयी|एक नजर "मागी"को देखा,दूजी नजर चारो ओर|फिर "मागी"को चावल की तरह सान उसके गोले बना हलक में उतारने लगी|
न अब अम्मा का धरम भष्ट हुआ,न उनकी आंते चिपकी|
अंजू निगम
इंदौर
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