संवाद

"सो गयी क्या"?सरदारजी बोले|
  "नहीं!!इस उम्र में नींद बैरन होगी|जल्द आती वी
नई|"बीबी बोली|"आपको भी नींद नई आयी"
    "कोशिश कर रहा हूँ|"
    "आज ठंड लगता ज्यादा है|आपको भी लग रही"|
  "नही तो!!!रोज जैसी है|कहो तो पंखा कम कर दूँ|"
  आप लेटो|मैं कर देती हूँ कम|आपके भी तो घुटने चटकते है|"
  सरदारजी के अंह जागा|"उम्र की क्या कहती हो बीबी|पचास सीढ़ी रोज चढ़ लेता हूँ एक सांस में|"
बीबी का पोपला मुँह फैल जाता है|
    दोनो के बीच मौन पसर जाता है|
"नींद लग गयी क्या?"बीबी बोली|
"नहीं सोच रहा हूँ कि पूराने दिन कितने अच्छे थे|घर भरा रहता था|अब खाली घर काटने को दौड़ता है|"
"हाँ सो तो है|सोच रही हूँ थोड़े दिन के लिये दीप को ले आँऊ|"
"रहने दो!!!कहाँ तुम संभाल पाओगी!पिछले बार जरा सी चोट खाने पर दामाद का मुँह कैसा चढ़ गया था|"
"सो तो है!!बेटा-बेटी सब गृहस्थी में रम गये|हम बुढ़ो की कौन सुध ले?"
  "मन छोटा क्यों करती हो|हम दोनो तो है|बगल की कोठी  में,जबसे तनेजा गया है, परजाई एकदम अकेली पड़ गयी|कभी मन में बड़ी हौल उठती है|रब हमारी जोड़ी बनाये रखे|"
     फिर सन्नाटा पसर गया है|
"क्या सोच रही हो?हर बात मन से मत लगा लिया करो|"सरदारजी परेशान हो उठते हैं|
"नही, सोच रही हूँ"
"क्या?"
"आस पास कितने घर है जो अकेले जी रहे है|पैसो की नही अपनो की कमी है|क्यों न हम मिल कर उन बच्चों को पढ़ाये जो स्कूल की फीस नही भर सकते|सब मिल कर करेगे तो हमारा अकेलापन कटेगा,अपने बच्चो का मुँह नहीं जोहना पड़ेगा और इन बच्चों को कुछ सीखने को मिल जायेगा|"बीबी बोली|
   "वाह क्या कहने!!मैं तो भूल गया था बीबी कि आप मास्टरनी रह चुकी है!!"कह सरदारजी  हल्के से हँस दिये|
   कमरे में फिर सन्नाटा खींचा है|शायद दोनो सो चुके है|
  एक मकसद तो मिल ही चुका है फिर से जी उठने के लिये|
             अंजू निगम
              इंदौर

  

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