पड़ोसन
नेहा को तेज बुखार था|विभोर देर रात तक उसके माथे की पट्टियाँ बदलता रहा|भोर नेहा की आँख लगी तो विभोर भी सो गया|
सुबह माँ ने विभोर से दूसरे कमरे में आराम करने को कहा और खुद नेहा के पास बैठ उसके माथे की पट्टियाँ बदलने लगी|तभी पड़ोसन हाथ में कटोरा लिये चीनी लेने आ धमकी|आँखो के सामने मसालेदार मुद्दा था|
"सास तीमारदारी में लगी थी और बहू फरमा रही थी आराम|"
"राम-राम,घोर कलजुग है!!जिज्जी इस उम्र में काहे अपनी जान हलकान किये हो|ई का उम्र है बहू के नखरे उठाने की|"पड़ोसन ने तीर तो मारा पर तीर गल्त आदमी पर चल गया शायद|
"काय बीबी,हमरी उम्र को का हुआ|तुमसे तो उन्नीस ही ठहरी|बहू को बुखार है तो का पड़ोसियों को न्योतने जाँऊगी बहू का सेवा करने|"
पड़ोसन तुनक कर बोली,"तुम जानो और वो तोहार नकचढ़ी बहूरिया|बाद में न कहना चेताया नहीं |
काफी दिनो बाद पड़ोसन की चीनी फिर खत्म थी| और वे फिर हाजिर थी|दृश्य वही,किरदार बदल गये थे|सास पलंग पर और बहू सेवा में|
बहू चाय बनाने गयी तो पड़ोसन भी रसोई मे हाजिर|
"का फुल सी बच्ची कुम्हला गयी|इत्ता काम काहे ओढ़ लियो|कोल्हू का बैल बनाये दियो बच्ची को|"पड़ोसन हैरान सी बोली|
"नहीं आंटी,आज सासूजी बीमार है तो मैं सेवा कर रही हूँ|नहीं तो वे भी अपनी उम्र का लिहाज न कर मेरे काम में हाथ बटाती है"ये बोल बहू ने एक शरारती मुस्कान उनके ऊपर फेंकी|
पड़ोसन समझ गयी कि यहाँ उसकी दाल नहीं गलने वाली|
अंजू निगम
इंदौर
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