१० बजे वाली गाड़ी
"रत्न आया के नाही"खांसी के बीच दरारो में रामू ने अपनी बात पूरी की|
"१० कहाँ बजे है?तुम तनिक कुछ उतार लो हलक में|टेम हो गया!!"बुधिया बोल उठी|कान किसी आहट पर चौकन्ने रहे|
रामू को खांसी का दौरा उठा और खांसते बेदम हो गया पर आँखे किसी आस में दरवाजा तकती रही|
"इधर कितनी बस्ती खड़ी हो गयी|उतरा भी होगा तो घुम कर आते बखत लगता है!"बुधिया ने अपने और रामू दोनो की आस को छड़ी पकड़ायी|
१० बजे की ट्रेन की आस सुबह से शाम और सुबह फिर नयी आस उगा जाती|सिलसिला चलता रहा इंतजार का|अंटी के पैसे रीसते गये|घर के बरतन बाजार पहुँचते गये|
"शायद किसना को चिट्ठी न मिली हो|नाही तो हमारा लाल ऐसा नहीं|"बुधिया बुदबुदाती|
आखिर उनका इंतजार खत्म हुआ|लाल की चिट्ठी आई|
"चिट्ठी देर से मिली|लौटती डाक से कुछ पैसे भेज रहा हूँ|शहर में बापू के इलाज का खर्चा बहुत आयेगा इसलिए वही हकीम से इलाज करवा ले|दम लेने की फुरसत नहीं|मौका मिलते आँऊगा|बार बार खेत और मकान गिरवी रख हम लोगो की पढ़ाई कराने की बात काहे दोहराते है|बच्चन का तो हम भी पाल रहे है"
उस दिन के बाद से बुधिया और रामू की आस मर गई|दरवाजे की हर आहट अब.भी कान खड़े करती है|
रामू की बीमारी लाइलाज हो चुकी है|१० बजे की गाड़ी अब भी आती है|पर उसमें किसना कभी नहीं आया|
दो जोड़ी आँखो का इंतजार भी जाती ट्रेन के साथ अंधेरे में खो गया हमेशा के लिए|
अंजू निगम
इंदौर
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