बराबरी

       विनय बैखौफ नीला से हँस-हँस कर बतिया रहा था|संज्ञा खिड़की से सारा नजारा देख रही थी|नीला कोई पहली लड़की नहीं थी,जिससे विनय यूँ उन्मुक्त हो बात कर रहा था|संज्ञा पूरी फेहरिस्त थमा सकती थी|
                         विवाह के बाद से ही विनय को न उसके न उसके परिवार में तारीफ करने जैसी कोई बात नजर आयी|तारीफ बिसार भी दे तो भी घर में मिंया-बीबी की लड़ाई हमेशा संज्ञा केमाँ-बाप पर कटु आक्षेपो पर खत्म होती|फिर संज्ञा का कोमल मन इतना विहल हो जाता कि आगे के सारे शब्द आँसु बन ढलक जाते|
      उसे याद आता है कि अपने स्कूल के दोस्त से फोन पर बात कर लेने भर से विनय ने उसके चरित्र को इतना उधेड़ा कि कितने दिन वो अपने को संभाल न पायी थी|उसे वाकई लगता कि वो चरित्रहीन हैं|
         और आज वही आदमी नीचे खड़ा किसी औरत से बैखौफ बाते कर रहा है|
    संज्ञा का मन एक लिजलिजे अहसास से भर गया|इस आदमी के लिये वो अपनी जिदंगी होम कर रही है?
        संज्ञा ने कुछ ठाना और  उन पत्रिकाओं के ई-मेल ढुँढने लगी जो ऐसे ही किसी वक्त के लिये एकत्र कर रही थी|
                      अंजू निगम

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