सोने की चेन
दादी की दी वो सोने की चेन दिव्या को बेहद अजीम थी| चेन खानदानी थी और उससे दादी का प्यार जूड़ा था|
माँ ने वो चेन खास मौको पर पहनने के लिये रखी थी|और आज वो खास मौका था भी|सोसायटी में नये साल का जश्न होना था|गहमागहमी ज्यादा होनी थी,सो दिव्या ने माँ से चेन पहन लेने की जिद की|
"चेन का कुडां कमजोर है|अगली बार पहन लेना|तब तक कुडां ठीक करवा लूंगी"माँ ने दिव्या को समझाया पर दिव्या के मन चढ़ी थी वो चेन,दूजे सहेलियों पर रौब गाठँने का ये सुअवसर वो हाथ से भला कैसे निकल जाने देती|
लाख मान मनुहार के बाद वो चेन दिव्या के गले में सज गयी|
नये साल का आगाज शानदार ढंग से हुआ|और सहेलियों पर खुब रौब भी पड़ गया|पर घर आ जब दिव्या का हाथ चेन उतारने के लिये गले पर गया,चेन तो गले में थी नही|सारे कपड़े झाड़ लिये पर चेन थी नहीं|
अब क्या हो?पापा तक बात पहुँचनी थी और पहुँची|दिव्या की जान हलक तक|माँ के पीछे छुपी दिव्या का निरीह चेहरा देख पापा का मन पिघल गया|पर इससे चेन तो मिलती नहीं|चेन की ढुंढ के लिये सारा घर लग गया|
घर के करीब रह रहे एक अंकल भी इस अभियान में शामिल हो गये|
दो घंटे के खोज अभियान से थके सब घर आ गये|उधर अंकल दिव्या की मम्मी से कह रहे थे,"भाभी कल कुछ लजीज बना कर खिलाईये|अरसा हो गया आपके हाथो की रसोई खाये"!!
इससे पहले पापा कुछ कहते अंकल ने अपनी हथेली फैला दी|उसमें सोने की चेन चमक रही थी|
दिव्या और सब घर सन्न|अंकल ने ही बताया कि जहाँ दिव्या बैठी थी वहाँ उन्हें कुछ चमकता सा दिखा|हाथ डाल कर देखा तो ये चेन हाथ में आ गयी|
सबको गर्व हुआ अंकल की ईमानदारी पर और दिव्या ने ठाना कि आगे से चेन को हाथ नहीं लगायेगी|
★ अंजू निगम★
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