पंड़िता के अंतर्गत
रामधन काका का फोन आया था|जब से पापा नहीं रहे यूँ बेवक्त आते फोन मुझे डराते है|काका ने हल्के से कहा कि आकर माँ के पास दो दिन रह जाँऊ|हल्का बुखार चढ़ा है|कहती कुछ नहीं पर आँखे आप और बिटिया को जोहती है|
मैंने जाने का मन बना लिया|माँ की गोद में सिर रखे कई दिन हो गये थे|रात तक जब पहुँचा, माँ सो चुकी थी|बुखार से बदन तप रहा था|उस रात मैं माँ की भूमिका में था|रात भर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखने से माँ का बुखार टुट रहा था|
मेरी और माँ की आँखे मिली और भीग उठी|माँ को भावनात्मक सुरक्षा मिल गयी थी|
उस रोज जब माँ सो गयी,मैं जरूरी सामान लेने जैसे ही बाहर निकला,गेट से चिपके चार-पाँच छोटे बच्चे नजर आये|मुझे देखते बड़े अदब से नमस्कार की मुद्रा में उनके साथ जुड़ गये|वहाँ खड़े होने का कारण पुछाः
"यहाँ क्यों खड़े हो आप सब"मैंने कहा|
"सर!हम माँ से पढ़ने यहाँ रोज आते है|तीन दिन से माँ दिखी नहीं तो हम उनके बारे में पता करने आये है|"बड़ी शिष्टता से एक बच्चे ने जवाब दिया|
इतनी छोटी उम्र में उसका ये लहजा मुझे प्रभावित कर रहा था| ये बच्चा किसे 'माँ'कह संबोधित कर रहा है, ये मुझे समझ तो आ रहा था पर पुष्टि के लिये मैं काका के पास गया|
काका ने ही बताया,"ये लड़के कुड़ा बीनने आते थे रोज|कौन सी ऐसी गल्त आदत नहीं थी,जो इनमें नहीं थी,पर अब देखिये,माँ ने कैसा कायापलट किया है इनका!!इनके माँ-बाप का बस चले तो माँ के चरण धो पीये|"
काका कहते जा रहे थे और मेरा सिर नतमस्तक हुआ जा रहा था ऐसी महा पंड़िता के आगे|
★अंजू निगम★
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