जिदंगी के नासूर के अंतगर्त
आज फिर बच्चवा छत पर चढ़ा पंतग के पेंच मांझ रहा था|सूरज सर चढ़ आया,अम्मा की नीचे से गुहार आयी,"का मुआ,सारे दिन पतंगबाजी में रमा रहता है|कोनो काम-धंधे का सुभीता है कि नाही|ईहा बुढ़िया खटके जा रही दिन रात"!!
माई की गुहार तनिक भी विचलित न कर पायी बच्चवा को|
पढ़ने-लिखने में मन रमा नहीं तो माई ने जोड़-तोड़ कर सब्जी का ढेला लगवा दिया|पर बच्चवा मनमौजी था,उसे ये काम रास न आया|
बाप का साया सर पर होता, तो ऐसा जवान होता लड़का का थोड़ा संभाल होता|रोटी-पानी का जुगाड़ सारा अम्मा का सिर आ लगा था|
उस दिन काम निपटा अम्मा घर खोल कर बैठी,उसी बखत बगल की सुगवा की आवाज उठी,"अम्मा तु यहाँ बैठी!!तेरे बच्चवा को पुलिस उठा ले गयी|सुना लंबे जायेगा|नशा का सामान मिला है उसका पास से|"
अम्मा और उठ न पायी,"आवारा था उसका बेटा पर आज तक उसके खिलाफ कोई केस दर्जनहीं हुआ था|इस एक बात की तो अम्मा को राहत थी|पर आज तो झोली में जो एक चीज बची थी उसे भी बच्चवा ने बेच दिया|
★अंजू निगम★
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