जीवन के काँटे
नीला जब बस से उतरी तो रात उतर आयी थी|मौसम में ठंड घुलने लगी थी|जिस बात से बचना चाह रही थी वही स्थिति सामने थी|
वैभव भी उसी बस से उतरा था|ठंड के मौसम में ऑटो मिलना बेहद कठिन होता|जो मिलते वो मौके का फायदा उठा दुगने दाम माँगते|
वैभव इस सर्द रात में एक अकेली लड़की को ठंड से ठिठुरते देख रहा था|और देख रहा था सामने से आती एक कार को|आ वो कार नीला के बगल में रूक गयी|वैभव तेज चलते नीला के बगल में आ खड़ा हो गया|वैभव को नीला के साथ देख भद्दे फिकरे कसते नयी उम्र के वे लड़के वहाँ से हट लिए|
वैभव ने पूछा तो नीला ने संकोच से अपनी विवशता बता दी|
"अगर विश्वास कर सको तो मैं तुम्हें तुम्हारे हॉस्टल पहुँचा दूँ|रात बढ़ रही है और ऑटो वालो के नखरे भी|ज्यादा अहसान नहीं करूँगा इसलिए ऑटो के पैसे आधे-आधे बांट लेगे|"
वैभव की ये बात नीला को सहज बना गयी|नीला को सही सलामत हॉस्टल पहूँचाने की जिम्मेदारी वैभव ने अपने ऊपर ले ली|
हॉस्टल के सामने नीला जब उतरी,उसका मन इस फरिश्ते के आगे नतमस्तक हो गया|नीला कुछ बोले उससे पहले वैभव ने उसके सर पर हाथ रख दिया|
"हॉस्टल जाओ बहना!!तुमको देखा तो लगा मेरी साक्षी ही मेरे सामने खड़ी है|अच्छा,अब चलु|ईश्वर ने चाहा तो फिर मिलेंगे|"
ऑटो में बैठा वैभव सोच रहा था,"उस दिन भी तो ऐसा ही मंजर था|उस दिन भी उन गुंडों के आगे उसने साहस दिखाया होता तो आज मेरी बहन साक्षी मेरे साथ होती|"
नीला को सही सलामत पहुँचा वैभव को ऐसा लगा कि जो फांस गढ़ी,काँटो की तरह उसे लहूलूहान कर रही थी,वो आज निकल गयी|
★अंजू निगम"★
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें