सफलताओं के चिराग

वो आज ही मेरे सामने के फ्लैट में आये है|साथ में छोटा बच्चा|तभी मैं समझी की वो शादी शुदा है|औपचारिकता वश मैंने चाय भिजवा दी|
   समय के साथ हम दोनो में मित्रता हो गयी,उम्र के फासलो के बावजुद|मेरे लेखन से वो खासा प्रभावित दिखी|और मैं उसकी साफगोई से|
       एक दिन उसने बताया कि वो पी.एच.डी करना चाहती है|बच्चा उसका छोटा था और घर में उसकी संभाल के लिए कोई व्यस्क नहीं|उसके पति उसके इस फैसले से खासा नाराज रहे|पर उसने घर-बाहर दोनो मोर्चा संभाल लिया|आड़े वक्त के लिये मैं थी|
    पी.एच.डी कर घर बैठने का कोई तुक उसकी समझ के बाहर था|जाहिर सी बात थी घर में एक बार फिर तुफान के बवंडर उठे|
      अगले दिन वो आई तो इटंरव्यु के लिये तैयार हो कर|बच्चे को मेरे सुपूर्द कर गयी|करीब दो घंटे बाद जब वो वापस आयी तो उसका चेहरा तमक रहा था|ज्यादा तो कुछ नहीं पर उसकी बातो से लगा कि नौकरी के ऐवज उससे ढके-मुंदे लफ्जो में पैसे की मांग रखी गयी|
" ऐसी नौकरी को मैं ठोकर मारती हूँ|जो करूँगी अपने बूते पर"
    ऐसा नहीं कि सफलताओं के चिराग यूँ ही जल गये|उसमे रोशनी भरने के लिए उसे पूरे साल इंतजार करना पड़ा|
            ★अंजू निगम★
     

    

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