कुँए की मिट्टी
कलकत्ता का सोना गाछी|एक बदनाम इलाका| जहाँ सुबह सन्नाटा पसरा रहता,राते आबाद रहती|
पर आज का नजारा अलग था|आज सुबह से ही चहल-पहल बनी थी|वजह भी थी|आज शिल्पकारो का एक समूह माँ दुर्गा की प्रतिमा गढ़ने यहाँ की मिट्टी लेने यहाँ था|ये पंरपरा बरसो की थी|बदलाव इतना भर था कि पहले मंदिर के पुजारी आते थे अब शिल्पकारो का समूह|
शाप्तो के घर का आंगन आज पवित्रता से भरा था|शिल्पकार मिट्टी लेने के लिये झोली फैलाये खड़े थे|
ये सारा आयोजन, झुमरी को अपने दूसरे तल्ले के घर से उतार शाप्तो के आंगन तक ले आया था|
झुमरी तीन साल पहले ही इस इलाके में आयी थी|पवित्र शिल्पकारो का समूह उसे आकर्षित करता|इन्हीं में एक अनिकेत था|झुमरी की मासूमियत उसे आकर्षित कर गयी थी|
अनिकेत सोचता कि वो कैसे झुमरी को इस जगह से मुक्त कराये|और झुमरी.......
उसका मन सोचता कि जैसे ये शिल्पी माँ दुर्गा की प्रतिमा गढ़ते हैं वैसै ही कोई आ कुँए की मिट्टी की तरह मुझे सहज ले| मेरी संभाल कर ले,दूनिया की नजरो से दूर,बस अपने तक सहेज ले|
झुमरी का ये सपना बहुत मासुम था|उधर अनिकेत एक निर्णय तक पहुंच चुका था|बस अमली जामा पहनाना बाकी था|
★अंजू निगम★
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