हाथो की बासी लकीरे फेंक,
कुछ मुरझाये खत खोला करता था,

यादो के अलाव जलाये,
रात भर आँखो से सूखी रूह गिराता.था|

सूरज की पीठ पर चढ़ ,
जब नया दिन उतरता था

दबे पांव पीछे से आकर,
उम्मीदे फिर जिस्म में चढ़ जाती थी|

वक्त के उड़ते परिंदे,
तब उम्र में बैठ जाया करते थे|

चेहरे पर चढ़ी जिल्द,
उम्र के साथ जिस्म बदलती थी|
      ★अंजू निगम★

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