खत
बाऊजी ऑफिस से आते ही सोफे में धंस गये|आज पानी का ग्लास ले माँ उपस्थित थी|
"पलक कहाँ रह गयी?अरे मुनिया,आज बाऊजी को पानी का ग्लास नहीं पकड़ाया|"
  बाऊजी की आवाज सुन भैया,छुटकी भी पलक के साथ बैठक में जुट गये|
   पलक का उतरा चेहरा और हाथ में फड़फड़ाता खत,भैया को अजीब लगा|
पलक के हाथ से खत ले पढ़ा तो सन्न रह गये,"अपनी रचना ने शादी कर ली"
बाऊजी ने सुना पर विश्वास न किया|भैया के हाथ से होता वो पत्र बाऊजी के हाथ गया|
इस लड़की ने मेरा बुढ़ापा खराब कर दिया|"बाऊजी के मुँह से यही निकला|
       बात भैया ने ही संभाली|दी की सहेली से दी के घर का पता ले भैया-बाऊजी उनके घर रवाना हो गये|बाऊजी को अब भी विश्वास था कि दी उनका मान रखेगी पर दी ने साबित कर दिया कि प्यार वाकई अंधा होता हैं|
   घर की ड्योढ़ी लांघ बात बाहर फैल लोगो के कानो में रस घोलने लगी|माँ ने अपने को घर तक सीमित कर लिया|
       समय का पहिया घुमा और लोगो के जेहन से ये बात उतरने लगी|शायद माँ के मन से भी|हंलाकि उन्होंने बाऊजी के साथ सारे दंश-अपमान झेले थे पर वे माँ थी|
     उस दिन पानी का ग्लास देते माँ बाऊजी से कह रही थी,"रचना आने को कह रही थी"|
   "अब सबने ही रचना -दामादजी को अपना लिया है|"
      "दामादजी"ये शब्द कितना अपनापन संजोए हैं|बाऊजी सोच रहे थे|
  बाऊजी को चुप देख माँ फिर बोल उठी,"तो मैं रचना को हाँ कह देती हूँ|"
    बाऊजी का मन फिर न पलट जाये,सोच माँ सामने से हट जाती हैं|
   पीछे कमरे से खिलखिलाने की आवाज आ रही थी बड़े दिनो के बाद|
      ★अंजू निगम★

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