अस्पताल की दौड़-धूप खत्म हुई|साकेत को घर ले आये|साकेत के सिर पर गहरी चोट लगी थी|जान तो बच गयी पर आँख की रोशनी जाती रही|
माँ-बाप को गहरा आघात लगा था|जवान लड़का,कैसा बसर होगा पूरा जीवन|डॉक्टर ने आशा बांधी थी कि कोई नेत्र दान करे तो शायद साकेत फिर से देख सके|
सुमित्रा अपने पोते का ये हाल देख गहरे सदमे में थी|बात करना एकदम ही बंद हो गया था उनका|बस रात-दिन पोते के साथ बनी रहती|
महीना बीत गया कोई डोनर नहीं मिला|इधर दादी पोते को छोड़"थोडी देर में आती हूँ "कह निकल जाती थी|पुछने पर संत्संग गयी थी,कह देती|
साकेत कभी-कभी बहुत बैचेन हो जाता |उसे काफी चिड़चिड़ापन रहने लगा|दादी पर खुब उबाल खाता|क्योंकि उस दिन वो दादी के काम से ही बाजार गया था,जब ये हादसा हुआ|
साकेत के हर आक्षेप पर सुमित्रा शांत ही रहती|उन्हें अंदाजा था कि साकेत बिना आँखो के कितना बेबस महसूस करता होगा|
उस दिन साकेत दादी से कुछ ज्यादा ही उलझ गया|हमेशा शांत रहने वाली सुमित्रा इतने कठोर आक्षेप सुन वहाँ से उठ कमरे से बाहर आ गयी|
रात ही उनके सीने में तेज दर्द उठा|बेटा माँ को ले अस्पताल जाने के लिये उपस्थित हो गया|पर माँ ने हाथ के इशारे से उसे पास बुला कुछ कागज उसके हाथ पर रख दिये,"अस्पताल तक नहीं पहुँच पाऊंगी बेटा|देर हो गयी हैं|मेरे जाने के बाद अस्पताल को तुरन्त फोन कर देना|इसमें देर न करना|"कह माँ का हाथ ढलक गया|
बेटे ने पेपर खोल कर देखे|माँ ने अपनी आँखे दान कर दी थी|
★अंजू निगम★
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