पलक बाल सुखाने बरामदे तक उतर आयी| लेटर बॉक्स की ओर नजर घुमी तो एक खत चमक रहा था|लपक कर खत उठाया
'अजीब बात हैं न नाम न पता'पलक ने सोचा|
पहले सोचा भाई के ऑफिस की कोई चिट्ठी हो|पर बैगर नाम-पते की तो कोई डाक भैया की भी नहीं आती|
'खोल ही लेती हूँ|जाने क्या हो?'पलक ने ये सोच लिफाफा फाड़ा तो अंदर एक खत था|खत क्या था मानो पलक ने तुफान थाम लिया हो|वो वही जड़ बनी खड़ी रही|
'दी ने शादी कर ली!!!गऊ सी दी के अंदर इतना साहस कैसे भर गया'
शाम को बाऊजी आये तो पलक सामने नहीं आयी बाऊजी को पानी देने|
'अरे मुनिया कहाँ रह गयी?'बाऊजी पलक को आवाज देने लगे|पलक आयी तो वही खत अब भी उसके हाथ में फड़फड़ा रहा था|भैया और छोटी भी बैठक में आ जुटे थे|शाम की सांझी चाय पी जाती थी|
पलक की भाव-भंगिमा और उसके हाथ में पकड़े कागज को भैया भांप गये|उसके हाथ का खत ले जब भैया ने पढ़ा तो वो भी चौंक गये|
'अपनी रचना ने शादी कर ली!!'भैया के मुँह से यही निकला|
बाऊजी ने सुना पर विश्वास नहीं किया|खत पढ़ा और कहा,'इस बुढ़ापे में मेरी मिट्टी खराब कर गयी'!
स्थिति भैया ने संभाली|खत में दी ने लिखा था अपने पति का नाम|दी की सहेली से घर का पता ले भैया-बाऊजी दी के घर चल दिये|बात घर तक थी संभल जाती|एक बार घर की ड्योढ़ी लांघ जाती तो बदनामी ही थी|
बाऊजी को विश्वास सा
था कि दी उनका मान रख लेगी पर दी ने साबित कर दिया कि प्यार वाकई अंधा होता हैं|
ज्यादा दिन बात दब नहीं पायी|फिर तो मुहोल्ले वालो ने जम कर तानो की रोटियां सेंकी|माँ ने अपने को घर तक समेट लिया|दोनो बहनो की गरदन और नजर दोनो नीचे हो गयी|
समय के साथ लोगो की याददाश्त कमजोर पड़ने लगी|
अरसे बाद आज मौसी आई थी अपने बेटे की शादी का न्योता लेकर|जब मौसी ने शादी का कार्ड और मान के रूपये जीजाजी के हाथ पर रखे तो उनकी आँख से दो बुँद आँसू के निकल आये|मौसी का आना मानो रिश्ते के टुटे तार फिर से जोड़ गया|
आज माँ बाऊजी से कह रही थी कि,'रचना आने को कह रही थी|'
बाऊजी वैसे ही भावहीन बैठे रहे|माँ ने भी बाऊजी का अपमान देखा और जिया था पर वो एक माँ भी थी|
माँ फिर बोली थी,'सबने तो रचना और दामादजी को अपना ही लिया हैं|'
"दामादजी"कितना अपनापन लिये था ये शब्द|
पीछे छुटकी बोल उठी थी,"सोम भी तो कितना सुदंर लगता हैं"
"सोम कौन?"बाऊजी बोले|
'हमारा नातिन"माँ हलक कर बोल उठी|
बाऊजी एक तीखी नजर माँ पर डालते हैं|तो सबकी बाते होती हैं?
बाऊजी के प्रश्न की अवहेलना कर माँ फिर पुछ बैठती हैं,'रचना को आने के लिये हाँ कह दूँ"?
बाऊजी केवल हूकांर भरते हैं|
उधर कमरे से हंसने-खिलखिलाने की आवाज़ आ रही हैं|महीनों बाद रिश्तों में पड़ी धूल के बादल छंटने लगे हैं|
★अंजू निगम★
CONVERSATION
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें
(
Atom
)
About me
Popular Posts
-
अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पा...
-
नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी ...
-
समय ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आह...
-
बैसाखी वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उस...
-
विश्व हिंदी दिवस की आप सभी सुधीजनों को शुभकामनाएं। इस अवसर पर अपने कुछ हाइकु पटल पर प्रेषित कर रही हूँ। हिंदी ही भाषा विश्व पटल पर मान बढ़ाये...
-
आज दीना बाबू को एहसास हुआ होगा|कि कभी कभी मान की अधिकता न केवल रिश्तो में दूरियाँ ले आता हैं बल्कि कितने काम बिगाड़ देता हैं| इतना कि फिर उस...
-
जेवर "जिज्जी, क्या सोचा? मालू की दुल्हन की गोद भराई में क्या देना है? सोना तो आग पकड़े है। पुन्नी बता रही थी कि पचास के ऊपर पहुँच गया है...
-
रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं| दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही ...
-
लकीरे राहुल के घर का आज गृहप्रवेश था|बड़े शौक से बनवाया शानदार घर| पूरा घर गुलाब और गेंदे की लड़ियों से गमक रहा था|अभी मेहमानो का आना शुरू न...
-
गुरु मंत्र मैं अपनी ही बहन का फोन "इग्नोर"करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय ...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें