दरवाजा

उस रोज दरवाजे पर जो दस्तक थी,
उन हाथो की थप अजनबी लगी|
दरवाजा खोला तो बहर शोहरत खड़ी थी|
उसके चारो ओर अजीब उजाला भरा था,
मेरी आँखे चुंधियाने लगी थी|

मन मेरा हाथ छुड़ा चल दिया,
मन मेरा कोमल था,अजनबी था दूनिया से|
मुझे मालूम था मन भटक जायेगा, बह जायेगा,
फिर हुआ भी वही,मेरा मन बह निकला|
बहते हुये मिल गया कामयाबी के समुद्र में,
और खो गया वही|

मैं और मेरा मन फिर कभी नहीं मिले,
अब दरवाजे पर होती हर दस्तक,
खौफजदा करती हैं,
जाने इस बार कामयाबी मेरा क्या छीज ले|
            ★अंजू निगम★

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