वो एक गुमशुदा

वो थी एक गुमशुदा सी,
अपनी मेहनत कागज में उतारती जाती थी,
कितनी बार उसके लिखने के नतीजे,
सिफर ही रहे|
पर फिर भी वो उतारती जाती थी,
अपना मन पन्नों पर|
एक आस लिये,
कि कल का सवेरा शायद उसके नाम का हो|
सिफर से कुछ ज्यादा होना,
नयी उम्मीदे जगाता था उसमें|
कह  जाता था धीरे से उसके कानो में,
बढ़ती जाओ,उम्मीदो की लाठी पकड़े|
कभी मन पीछे खींच लेता था उसे,
ये कह कि क्यों वो शमा जलाओ,
जो रास्ता तुम्हें ही नहीं दिखाती |
पर फिर कुछ तंज तल्खी भरे,
बींध जाते हैं उसके मन को|
और फिर वो उतारने लगती हैं,
अपना मन पन्नों पर,
एक गुमशुदा की मानिंद|

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