उस दिन जब हम मिले,
तुमने वही जज्बातों की चादर ओढ़ रखी थी,
जिसमे थोड़ा तुम भीगी थोड़ा मैं|
उस दिन जब हम मिले,
तुमने रिश्तो के कितने ही धागो से लपेट रखा था अपने को,
फिर कुछ तुमने कुछ मैंने उन बीते लम्हों की सीवन उधेड़ी|
उस दिन जब हम मिले,
मैं तुम्हें उन गलियों में ले गयी थी,
जहाँ यादे बिखरी थी बेतरतीब,
कुछ मैं समेट लायी थी कुछ तुम|
पर उस दिन मिलने में था,
कुछ छुटा सा,कुछ अधुरापन लिये,
शायद ये ख्याल साथ था ,
कि वक्त की बंदिश हैं,
और कल फिर तुम्हारा साथ छुटेगा,
एक बार फिर मिल लेने के लिये|
तसल्ली सी भी थी कि,
रिश्ता तो रहेगा ही,
साथ का न सही यादो का ही सही|
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