तुम्हारे उतारे हुये दिन,
अब भी वैसे ही रखे हैं,
जैसा छोड़ गयी थी तुम|
वो अलमारी जिसके हर हिस्से में,
तुम्हारे हाथो के निशान चंस्पा हैं|
उसके अंदर रखी सारी यादो को मैंने तह लगा रखा हैं|
सोचा एक बार इन्हें तुम्हारे हिस्से की,
धूप दिखा दूँ,
पर धूप कतराती हैं यहाँ तक आने को|
मुझे अहसास तो हैं कि गुजरते वक्त के साथ,
ये यादे भसकने लगेगी|
पर तुम्हारे हाथो के बगैर इन याद में,
कहाँ से गरमाहट लाऊँ|
उस अलमारी और वो सारी जगह,
जहाँ तुम अपनी यादे चिपका गई हो,
मुड़ कर नहीं जाना चाहता,
डरता हूँ ये फिर जकड़ लेगी मुझे अपने में,
बांध लेगी एक अंजान कशिश में|
बंद कर दिया हैं अब मैंने,
तुम्हारी यादो से भरा वो कमरा,
पर ये किसी दरार से निकल,
रोज, हर पल मुझे आवाज देती हैं|
काश!!तुम अपने साथ अपनी यादो को भी समेट लेती,
तो आज मैं भी थोड़ा जी लेता|
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