उस बंद गली के आखिर मे,
जहाँ मौसम कभी बदलते नहीं,
या बदलते मौसम के अहसास नहीं रहते,
तुम खड़े थे|
उस बंद गली की तरह ही तुम्हारा,
मन भी बंद था|
तुम एक अजनबियत ओढ़े थे|
तुम वही ठहरे रहे,ठिठके रहे,
मैं ही बढ़ती रही|
तुम्हारा अहम् जवान था,
मेरा मन बुढ़ा|
मेरा मन अहम् से परे था|
पर फिर भी मैं रूक गयी|
सोच कर कि इस बंद गली से तुम्हारे मन में,
जहाँ एक तुम ,अपने से अजनबी हो,
बस कर भी क्या हासिल होगा|
मन ने ये सोचा,
उस दिन भी जब तुम मिले हम अजनबी थे,
आज जब मिले तब भी अजनबी ही हैं|
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