नहीं चाहा मैंने

मैंने कभी तो नहीं चाहा कि,
उन जागती में अपने ख्वाब तुम्हें पहनाऊं,
मैंने तो कभी नहीं चाहा कि,
जो अनकहा सा रह गया हैं वो तुम्हें सुनाऊं|
कभी तो पतझंड के गिरते पत्तो में ,
तुम्हें नहीं गिना मैंनें|

दिन के उजालो सी चाँदनी,
तुमसे कहाँ माँगी मैने|
मैंने कभी नहीं चाहा कि,
अजनबी से तुम मुझे पहचानने लगो|
मैंने कभी तुम्हारी आँखों में,
अपने लिये इंतजार नहीं माँगा|

मैंने बस यही चाहा कि तुम उम्र-उम्र जीओ,
और मैं बस दुआ-दुआ करूँ|
मैंने बस यही चाहा कि तुम मुझे,
मेरे 'मैं' में रखो 'सब'में नहीं|

मैं बस यही चाँहू कि,
न बनू मैं मीरा न राधा,बस मैं रूकमणि-रूकमणि सी बनू|

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top