वो मकान

आज फिर खड़ी उस मंका के नीचे,
जहाँ मैंने अपना बचपन जीया था|
जहाँ बीते थे कुछ खट्टे-मीठे पल,
आज वो सारी यादें मीठी लगती हैं|

दहलीज पर ही लरज उठे पैर मेरे,
जो अक्स जमा थे मेरे मन में बचपन के,
कही उसकी तस्वीर न बदले |

ये मंका जिसका जर्रा-जर्रा बसा हैं मेरी रूह में,
सारा रीस-रीस उतरता जा रहा हैं आज भी|
उस कमरे में रखी वो रंग उखड़ती अलमारी,
जिसकी किसी दराज में पीले पड़ते वो पन्ने,
जो मेरा बचपन समेटे हैं अपने में|

उन पन्नों पर उभरे कितने चेहरे समा गये हैं सय के गर्त मे,
पंलग की तिपाई पर रखा वो पानी का जग,
वो खिड़की-दरवाजो को ढापते सुनहरे परदे,
क्या होगा वैसा ही जैसा छोड़ आयी थी अरसा पहले,

कदम हो लेते हैं मेरे दहलीज से ही वापस,
जो तस्वीर टंगी हैं मेरे मन में बचपन की,
वही बसी रहे मेरे मन के कोनो में,
उम्र तमाम होने तक मेरी भी|
  ★ अंजू निगम★

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top