आज मैंने भी टांगी हैं मन के तारो पर,
कुछ ख्वाब, कुछ ख्वाहिशें,
चटकती धूप सी रोशनी लिये,
भरने के लिये कुछ नमी,
सुखती सी जिदंगी में|

आज मैंने भी किसी कदमो की आहट नापी हैं,
आज मैंने भी घोले हैं कुछ पोशिदा रंग,
मन की डोर को इज कुछ ढीला छोड़ा हैं|

ख्वाबों को हकीकत बनते आज जाना हैं,
मेरे तोशक ने आज उकेरी हैं ,
पाकीजा पन्नों पर कुछ नूरानी तस्वीरे,
एक नज्म बांधी हैं आज अपने मुफीद सफर की|

जाने कितने हौसले जो सोये थे कितने ही पहर,
उन्हें आज पहनाया हैं चोला गैर मगलूबी का|

आज उन ख्वाबों से कुछ ऐसा नूर बरसा हैं,
लगा जैसे इस तेज धूप में अकेली नहीं हूँ मैं|

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