अबकी आना तो कुछ खुशियाँ बांध लाना,
कुछ उगते सूरज सी लालिमा खरीद लाना,
साथ में कुनकुनी धूप की गरमाहट ढांप लाना|
जो सूकुन बंद हैं. रूह की गठरी में,
उनकी गांठे खोल आना ,
अब तक जो सर्द अहसासों के बोझ लादे थे,
वो बोझ वही उतार आना तुम|
अबकी आना तो होठो पर हंसी सजा लाना,
इंतजार करती दो आँखो के लिये वक्त ले आना,
जिन अश्को को बांधा हैं अब तक पैमानों में,
उन्हें वही रोक रखने की तसल्ली ले आना|
अबकी आना तो बांध लाना पूरा दिन मेरे लिये,
कुछ शिकवे-शिकायत जो बने थे दरमियान,
उन्हें वही दहलीज के बाहर टांग आना|
आ सहेज लेना वो एलबम जिसमे,
चाँदनी बिखरी होगी यादो की,
सुरमई शाम जो रात की चादर खींच रही हैं अपनी तरफ,
उस चादर में रात के तारे तुम बुन लाना|
आज जो अधूरी-अधूरी खड़ी हूँ मैं,
उन्हें आ पूरा बनाना तुम,
अबकी आना तो कुछ खुशियाँ बांध लाना|
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें