ऊपर जा उसने आस-पास नजर दौड़ायी|अब प्राजंल को खोजना कितना मुश्किल हो जायेगा|एक-एक स्टोर में अंदर जाकर भी तो नहीं देख सकता जबकि तीन थैले उसके हाथ वैसे ही पकड़े थे|
अभी इस ऊहा-पोह से गुजर ही रहा था कि सामने से प्राजंल आती दिखाई दी|विवेक को राहत मिली|
'कैसी तो हो गयी हैं प्राजंल?आँखो के नीचे काले घेरे,जर्जर सा शरीर!!!सब ठीक तो होगा उसकी तरफ?"
प्राजंल सामने आ गयी थी पर उसके चेहरे पर पहचान के कोई भाव न दिखे|विवेक ने ही उसको आवाज दी|
प्राजंल चौंक गयी|इस शहर में कौन मुझे पहचानता होगा?ध्यान से देखने पर उसके चेहरे पर पहचान के भाव उभरे |और विवेक को लगा बहुत खुश हो लेने के भी|
"अरे!!!!विवेक तुम!!इस शहर में क्या कर रहे हो?प्राजंल ने कहा|
"यही बात मैं तुमसे पुछता हूँ|इस शहर में तुम कैसे?तुम तो मुबंई चली गयी थी न|तुम्हारे मिंया नजर नहीं आ रहे?"विवेक कुछ टटोल रहा था शायद|
"तुमने गौर नहीं किया|तुम देख नहीं पाये कि मैं विधवा हूँ सधवा नहीं?"प्रांजल के स्वर में टुटन थी या रोष, विवेक समझ नहीं पाया|
"मुझे माफ करना|इतने दिनो बाद तुम्हे देखा| इसी रूप को तो देखा था मैंने हमेशा|सो मैं परख नहीं पाया"विवेक के स्वर में अफसोस था|
"नहीं जाने दो|मैं हमेशा अपनी हो रौ में बहती जाती हूँ|"प्राजंल फीकी हंसी हंसी|
विवेक को प्राजंल की ये मायूसी अच्छी नहीं लगी| कई प्रश्न उसके दिमाग में गुंज रहे थे|जवाब चाहता था पर प्राजंल को अच्छा लगे या नहीं ये मुद्दा था|तभी प्राजंल ही बोल उठी," यहाँ खड़े इस तरह बात करना अच्छा नहीं लगता|बाते ढेर सारी हैं करने को|किसी दिन घर आओ|माँ को अच्छा लगेगा तुमसे मिल कर|"
"तुम्हे नहीं अच्छा लगा मुझसे मिल कर"विवेक पुछना चाहता था पर चुप लगा गया|
प्राजंल ने अपने घर का पता दिया और आते रविवार मिलने का वादा ले वो चली गयी|
विवेक को लगा आज वो फिर से जी उठा हैं|
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