चौथी किस्त

विवेक का रविवार तक का सफर बड़ी मुश्किल से गुजरा|पता नहीं प्राजंल के अंदर भी यही बैचेनी पलती हैं या नहीं?
    रविवार को बताये पते पर विवेक हाजिर था|समय से कुछ बाद में ही पहुँचने की उसने लाख कोशिश की|यूँ उतावलापन दिखाना भी तो ठीक नहीं|
  प्राजंल के घर के हालात देख उसे धक्का लगा|माना की प्राजंल के पति अब इस दूनिया में नहीं|पर वो तो काफी रईस हुआ करते थे फिर???और प्राजंल का माँ के साथ रहना?सब ठीक नहीं|वो प्राजंल से पुछ ही बैठा|
"प्राजंल, तुम्हारे ससुराल की तरफ तो सब ठीक हैं?क्या पति के बाद तुम यही बन आयी हो?"
  विवेक का यूँ सपाट तरीक़े से पुछ लेना प्राजंल को अखर गया|पर विवेक शायद अब भी उन्हीं गलियों में घुम रहा हैं|जहाँ उसे छोड़ आयी थी|पर वो भी बात करना ही चाहती हैं किसी से सारे दर्द अपने बाँटना चाहती हैं|अपनी घुटन से तो वो भी बाहर आना ही चाहती हैं|
  प्राजंल ने विवेक को इशारे से बताया कि माँ के सामने इस तरह की कोई बात न उठाये|अपनी इकलौती बेटी को इस लिबास में देखना क्या किसी सदमे से कम था|सो,माँ जब खाना खा आराम करने गयी तभी प्राजंल ने बात शुरू की|
"प्राजंल के रूप पर मोहित होकर ही तो प्राजंल की सांस ने प्राजंल का हाथ अपने बेटे के लिए माँगा था|उन्हें लगा कि उनका नवाबजादा बहू के रूप में फंस घर-गृहस्थी का हो रहेगा|पर उसका ये मोह चार दिन की चाँदनी सा साबित हुआ|बेटा सुधरा नहीं|जब तक ससुर जी की हिम्मत रही सब चलता रहा|जिस दिन उन्होंने खाट पकडी सब ठप्प होने लगा|बेटा बजाये सुधरने के शराब में डुब गया|इस हद तक की शराब ही उसे लील गयी|पति के जाने के बाद उस घर में बहू का क्या
काम रह जाता|वैसे भी बेटे को खा जाने का इल्जाम भी तो उसी के नाम लिखा गया|एक बार मायके माँ को देखने की उसे सजा मिली|और ससुराल से हमेशा के लिये उसका नाम काट दिया गया|तब से आज तक वो यही बनी थी|आमदनी का कोई जरिया था नहीं और न ही प्राजंल ने अपने को इतना काबिल बनाया था कि आड़े वक्त कोई नौकरी कर सके|अपने पापा की जान-पहचान की वजह से ही उसने दो-तीन सिलाई-मशीन खरीद पायी और घर पर ही रह उसने सिलाई-केंद्र खोला था|"
    विवेक को याद आया कि प्राजंल सिलाई के काम से कितना चिढ़ती थी|पर अब देखो हालत ने उसे समझौते करना सिखा दिया|

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