विवेक का रविवार तक का सफर बड़ी मुश्किल से गुजरा|पता नहीं प्राजंल के अंदर भी यही बैचेनी पलती हैं या नहीं?
रविवार को बताये पते पर विवेक हाजिर था|समय से कुछ बाद में ही पहुँचने की उसने लाख कोशिश की|यूँ उतावलापन दिखाना भी तो ठीक नहीं|
प्राजंल के घर के हालात देख उसे धक्का लगा|माना की प्राजंल के पति अब इस दूनिया में नहीं|पर वो तो काफी रईस हुआ करते थे फिर???और प्राजंल का माँ के साथ रहना?सब ठीक नहीं|वो प्राजंल से पुछ ही बैठा|
"प्राजंल, तुम्हारे ससुराल की तरफ तो सब ठीक हैं?क्या पति के बाद तुम यही बन आयी हो?"
विवेक का यूँ सपाट तरीक़े से पुछ लेना प्राजंल को अखर गया|पर विवेक शायद अब भी उन्हीं गलियों में घुम रहा हैं|जहाँ उसे छोड़ आयी थी|पर वो भी बात करना ही चाहती हैं किसी से सारे दर्द अपने बाँटना चाहती हैं|अपनी घुटन से तो वो भी बाहर आना ही चाहती हैं|
प्राजंल ने विवेक को इशारे से बताया कि माँ के सामने इस तरह की कोई बात न उठाये|अपनी इकलौती बेटी को इस लिबास में देखना क्या किसी सदमे से कम था|सो,माँ जब खाना खा आराम करने गयी तभी प्राजंल ने बात शुरू की|
"प्राजंल के रूप पर मोहित होकर ही तो प्राजंल की सांस ने प्राजंल का हाथ अपने बेटे के लिए माँगा था|उन्हें लगा कि उनका नवाबजादा बहू के रूप में फंस घर-गृहस्थी का हो रहेगा|पर उसका ये मोह चार दिन की चाँदनी सा साबित हुआ|बेटा सुधरा नहीं|जब तक ससुर जी की हिम्मत रही सब चलता रहा|जिस दिन उन्होंने खाट पकडी सब ठप्प होने लगा|बेटा बजाये सुधरने के शराब में डुब गया|इस हद तक की शराब ही उसे लील गयी|पति के जाने के बाद उस घर में बहू का क्या
काम रह जाता|वैसे भी बेटे को खा जाने का इल्जाम भी तो उसी के नाम लिखा गया|एक बार मायके माँ को देखने की उसे सजा मिली|और ससुराल से हमेशा के लिये उसका नाम काट दिया गया|तब से आज तक वो यही बनी थी|आमदनी का कोई जरिया था नहीं और न ही प्राजंल ने अपने को इतना काबिल बनाया था कि आड़े वक्त कोई नौकरी कर सके|अपने पापा की जान-पहचान की वजह से ही उसने दो-तीन सिलाई-मशीन खरीद पायी और घर पर ही रह उसने सिलाई-केंद्र खोला था|"
विवेक को याद आया कि प्राजंल सिलाई के काम से कितना चिढ़ती थी|पर अब देखो हालत ने उसे समझौते करना सिखा दिया|
CONVERSATION
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें
(
Atom
)
About me
Popular Posts
-
अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पा...
-
नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी ...
-
समय ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आह...
-
बैसाखी वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उस...
-
विश्व हिंदी दिवस की आप सभी सुधीजनों को शुभकामनाएं। इस अवसर पर अपने कुछ हाइकु पटल पर प्रेषित कर रही हूँ। हिंदी ही भाषा विश्व पटल पर मान बढ़ाये...
-
आज दीना बाबू को एहसास हुआ होगा|कि कभी कभी मान की अधिकता न केवल रिश्तो में दूरियाँ ले आता हैं बल्कि कितने काम बिगाड़ देता हैं| इतना कि फिर उस...
-
जेवर "जिज्जी, क्या सोचा? मालू की दुल्हन की गोद भराई में क्या देना है? सोना तो आग पकड़े है। पुन्नी बता रही थी कि पचास के ऊपर पहुँच गया है...
-
रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं| दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही ...
-
लकीरे राहुल के घर का आज गृहप्रवेश था|बड़े शौक से बनवाया शानदार घर| पूरा घर गुलाब और गेंदे की लड़ियों से गमक रहा था|अभी मेहमानो का आना शुरू न...
-
गुरु मंत्र मैं अपनी ही बहन का फोन "इग्नोर"करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय ...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें