दूसरी किस्त

एक समय था जब प्रांजल शब्द रात-दिन उसके साथ बने रहते थे|दो साल का साथ था दोनो का|प्यार था मगर एकतरफा|प्राजंल की तरफ से कभी कोई ऐसा संकेत नहीं मिला और विवेक ने कभी अपने मन की बात जुबान तक नहीं आने दी|
   विवेक के दिल का हाल पता था उसके दोस्तो को|पर विवेक की ओर से कभी कोई बात उठा लेने की मनाही थी|
      प्रांजल तो सारे दिन बोल विवेक का दिमाग खाती पर एक यही बात उसकी जुबान तक कभी नहीं आयी|प्राजंल थी अपने माँ-बाप की एकलौती संतान|सारे नाज-नखरो से भरपूर|विवेक तो उसके हर नखरे उठाने को तैयार था|पर एक सीमा तक आ खाली जेब बाधा डालती|
विवेक को अहसास था इस बात का|तभी न जब उसकी प्राजंल की डोली उठी तो वो आगे बढ़ ये नहीं कह  पाया कि वो प्राजंल का हाथ थामना चाहता हैं ताउम्र|
        प्राजंल की शादी भी तो खुब अमीर घर में तय हूई थी|और वो प्राजंल का हाथ माँगता भी तो किस बिना पर|प्राजंल ने तो कभी उसे प्यार करने लेने का कोई संकेत नहीं दिया था|
    उसका प्यार विदा हो गया|उसके बाद उस शहर में विवेक का मन नहीं लगा|वो दिल्ली आ गया और यही बस गया|पर आज इतने सालो बाद प्राजंल को देख उसके पुराने जख्म फिर हरे हो गये|

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