ये तो जीवन नहीं

विवेक मॉल से सामान ले जल्दी बाहर की तरफ निकल रहा था| तभी उसे 'वो' दिखाई पड़ी|सीढ़ियों के आखिरी पायदान में खड़ी ऊपर आती हूई|विवेक को थोड़ा वक्त लगा उसे पहचान लेने में|४साल के छोटे वक्त ने उस पर गजब का बदलाव किया था|
         बला की खूबसूरत लड़की एकदम उजाड़ दिखे तो शक रह ही जाना था कि आखिर ये वही हैं जिससे विवेक ने अपने से ज्यादा प्यार किया था|
  प्रांजल नाम था उसका|अपने जमाने में कॉलेज की 'स्टाईल आईकॉन'|जीवन से भरी|पढ़ाई से ज्यादा उसके रूप के चर्चे होते|
        आज  वही प्राजंल एकदम अलग रंग में लिपटी थी|ऊपर की ओर जाती प्रांजल को आवाज देना उसे उचित नही  लगा|दस कान हैं सुनने वालो के|फिर वो किस अधिकार से पुकारे प्राजंल को?उस रात फेरो की अग्नि उसका सारा प्यार भी तो स्वाहा कर चुकी थी|
       विवेक पशोपेश में खड़ा रहा नीचे|क्या वो प्रांजल से मिलने फिर सीढ़ियाँ नापता ऊपर जाये या इसे महज इत्तेफाक समझ बाहर निकल जाये|
  विवेक भी जानता था कि प्रांजल से मिल लेने का ये मौका गंवाने का उसे जिदंगी भर अफसोस रहेगा|फिर उसे प्रांजल के इस बदले रूप ने भी उत्सुक कर दिया|नितांत अकेली ही दिखी वो|
     कुछ उत्सुकता और कुछ प्रांजल से फिर मिल लेने के लोभ ने विवेक के पैर खुद-ब-खुद पायदान पर जम गये|

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