माँ चाहती हैं कि अकुंश इस'जेल'के दमघोंटू माहौल से दूर कही होस्टल के खुले वातावरण में सांस ले| पर अंकुश हमेशा माँ की ये बात काटता हैं|माँ के पास कहाँ इतने पैसे जूटे हैं कि वो अंकुश पर इस बात के लिये जोर डाल सके!!पापा माँ के हाथो उतना ही पैसा रखते हैं जिससे पूरा महीना खिंच जाये|लेकिन उससे माँ के खाते में एक नया पैसा नहीं जूट पाता|अंकुश हमेशा सोचता हैं कि बस वो कमाने लगे फिर अपनी माँ की कोई इच्छा अधूरी नहीं छुटेगी|
पापा ने माँ को एक'औरत'का ही स्थान दिया|पत्नी का स्थान देना भूल गये|न माँ ने ही कभी अपने इस गरिमहीन पद से उठने का कोई प्रयास किया|जबरदस्ती तो रिश्ते नहीं थोपे जाते|
अंकुश ने देखा तो है|माँ ने पापा के रिश्तेदारो में अपने लिये एक कोना भर बना लेने को अपना जीवन होम कर दिया|पर उनके तरफ से की गई सारी मेहनत, पापा द्वारा सबके सामने माँ का बेवजह मजाक बनाने,फटकार लगाने, आक्षेप लगाने में तिरोहित हो जाती|शायद पापा को लगता हैं कि माँ के सीने में जो दिल हैं उसमें अहसास पनपते ही नही हैं|
अंकुश नहीं समझ पाया आज तक कि क्यों माँ से हूई छोटी सी गल्ती भी अक्षम्य अपराध बन जाती हैं और पापा की तरफ से हूई बड़ी गल्ती को'अरे!!!जरा चुक हो गयी'कह उड़ा दी जाती हैं|
उसे आज भी याद हैं कि कैसे एक बार पापा के खाना खाते समय माँ के उन्हे पानी देते हाथ लड़खड़ा गये थे|थोड़ा पानी छलक कर पापा की थाली के पास गिर गया था|
"क्या फूहड़ जैसे काम करती हो?क्या तुम्हारे घरवालों ने जरा शऊर नहीं सिखाया हैं?जरा थोड़ा सलीका अपनी माँ से सीख आती?"
माँ सब सह लेती है पर नानी पर लगते बेवज ह के आरोप सहन नही|
"माँ को क्यों बीच में ले आते हैं हर बार"अपनी माँ का आहत स्वर अंकुश के कान मे जाता हैं|
"वो इसी लायक हैं"पापा की क्रूर आवाज आती हैं|
माँ पापा को क्षण भर देखती हैं|
"क्या घुर रही हैं?"कह पापा उस कड़कड़ाती ठंड में माँ के ऊपर पानी का पूरा गिलास उड़ेल देते हैं|
माँ अवाक सी खड़ी देखती रह जाती हैं|उनकी आँखो के कोर भीगे या नहीं, वो बता नहीं पाया|माँ धीरे चलती उसके कमरे मे आयी थी|तब पहली बार उसने माँ के चेहरे पर क्षोभ देखा|अंकुश को अपने से चिपकाये वो देर तक बैठी रही|उस रात माँ सोई या नहीं वो नहीं देख पाया|
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