माँ तुम्हे जीना हैं

आज अंकुश की आँख जल्दी खुल गयी हैं|गणेश स्थापना का पावन दिन  हैं|आज के दिन से अगले १०दिन अंकुश और उसकी माँ के अच्छे बीतते हैं|घर में उत्सव सा माहौल रहता हैं|अंकुश को लगता हैं कि गणेश रोज ही उनके आंगन विराजे|
     इन दिनो माँ के चेहरे पर जैसी स्निगधता वो देखता हैं|वैसी साल  भर  देखने को तरसता हैं|माँ को हमेशा तो वो यूँ ही खुश देखना चाहता हैं|माँ को रह रह कर वो जताता हैं कि वे यूँ ही खुश रहा करे|पर अंकुश भी तो जानता ही हैं कि माँ का यूँ खुश घुमना पापा को जरा रास नहीं आता हैं|
  उसे आज तक समझ नहीं आया कि माँ ने पापा से शादी कर ऐसा कौन सा अपराध किया जिसकी सजा पापा माँ और माँ के'घरवालो'को अब तक देते आये हैं|अंकुश को तो अपने ननिहाल में कोई खोट ढुंढे नहीं मिला|उन लोगो को कभी उसने ऊँची आवाज में बात करते भी नहीं सुना|
    पर सही कहे तो अंकुश को कभी नानी पर बेतरह गुस्सा आता हैं|क्यों उन्होंने माँ के मुँह में जुबान नहीं डाली|क्यों वे माँ को पुराने संस्कारो की घुट्टी पिलाती रही|क्यों औरत होकर भी उन्होंने कभी माँ के दर्द को समझ उनका साथ नहीं दिया|
   १४ बरस की आयू में इससे अधिक सोच लेने की उसकी क्षमता नहीं|वो बस माँ को खुश देख लेना चाहता हैं|
      इधर पापा का स्वभाव और उग्र होता जा रहा है|माँ दिनो दिन चुप होती जा रही हैं|बस पापा जिस दिन ज्यादा उग्र होते हैं, माँ दिन भर उससे बात करती जाती हैं|तब वे अपना चेहरा अजीब दिखावटी हंसी से सजा लेती हैं|अंकुश के तह लगाये कपड़ो को फिर से तहाने लगती हैं|या फिर उसका सिर गोद में ले देर तक उसका माथा सहलाती हैं|
       ऐसे हालात में अंकुश का मन बहूत डरता हैं|वो चाहता हैं माँ उससे सारी बात कह ले ताकि माँ के मन का गुबार निकल जाये|पर माँ कभी भी पापा से जूड़ी कोई बात नहीं उठाती|

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