अंकुश अब बड़ा होने लगा हैं|उसकी बुद्धि समय के साथ परिपक्व होने लगी हैं|पापा का माँ के प्रति व्यहवार अब उसे सालने लगा हैं|वो प्रश्न पुछने लगा हैं अपने से ही'आखिर क्यों और कब तक?
पापा की क्रूरता का जवाब अब वो देने लगा हैं|उन्हीं के अंदाज़ मे|आखिर ऐसी जुबान उन्हीं की तो देन थी|जो बोया काटना तो पड़ेगा न!!
"माँ का चमचा!मेरे फेंके पैसो पर पलता हैं और मुझ पर ही आँखे तरेरता हैं|एक दिन तुझे उठा कर दूर होस्टल फेंक आऊँगा तब देखता हूँ कैसे माँ की पैरवी करने आता हैं'
पापा के कहे शब्द अंकुश को भीतर तक घायल करते हैं|बचपन से वो माँ के लिये इसी तरह के शब्दों को सुनता आया|ऐसे माहौल ने उसकी जुबान को भी नुकीला बना दिया हैं|
"मुझसे जरा तमीज से बात किया करिये|माँ मत समझ लीजिएगा मुझे|जो आपकी की हर ज्यादती को चुपचाप सहन कर लूँ|"ये कह अंकुश पापा के आगे तन कर खड़ा हो जाता हैं|
इन परिस्थितियों सै माँ बेतरह घबराती हैं|स्थिति और विस्फोटक न हो,वो अंकुश से बार-बार चुप रहने की ताकीद करती हैं|
"सिर पर तो तुने ही चढ़ाया अब अच्छेपन का स्वांग रचती हैं"पापा माँ से सड़कछाप भाषा मे बात करते हैं|
"आइंदा मेरी माँ से इस लहजे में बात मत करियेगा|नहीं तो मैं भी भूल जाँऊगा कि आप मेरे पापा हैं|"
पापा हैरान खड़े हैं|ये भाषा बोलने का अधिकार तो केवल उनका था|उनके अपने बेटे ने ये अधिकार कब उनसे छीन लिया?क्यों नही समय रहते उन्होंने अपने बेटे को अपनी तरफ मिला लिया|अपने ही घर में राजनीति खेलना,उन जैसा ओछा आदमी ही कर सकता था|वो भी केवल अपना मान रखने और माँ जैसी निरीह स्त्री के खिलाफ?
आज जाने क्यों माँ के मन में वाकई सूकुन उभर आया हैं|अरसे बाद आज उनकी ओर से बोलने वाला उसका अपना बेटा खड़ा हैं|
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